भारत मानव सभ्यता का प्राचीन केंद्र रहा है, और इसके अनेक ग्रन्थ उस सभ्यता के साक्षी हैं, पर विज्ञान का युग उन ग्रंथों की कथाओं को काल्पनिक एवं मिथ्या मानता रहा है।
जब भारत में अंग्रेजी सभ्यता का आरंभ हुआ, तब उसने यहाँ अपनी सभ्यता के द्वार खोलने चाहे, पर उनके मार्ग में भारत के आध्यात्मिक ग्रन्थ बाधक थे। भारत की प्राचीन सभ्यता का ज्ञान यहाँ के बच्चे-बच्चे को था। भारत में अंग्रेजी सभ्यता का प्रसार हो उसके लिए इन बच्चों को उनकी जड़ों से दूर करना ही एकमात्र उपाय था।
वह विज्ञान की क्रांति का भी युग था, कृषि क्षेत्र में भी कई सफ़ल प्रयोग कर अन्न की पैदावार बढ़ाने के प्रयोग चल रहे थे। पौधों में ग्राफ्टिंग कर के एक ही वृक्ष पर अनेक रंगों के फूल सजाये जा रहे थे, इसमें पौधों की जड़ें तो वही रहती हैं, पर उनका ऊपरी स्वभाव बदल जाता है।
जब अंग्रेजी शिक्षा ने भारत में जगह बनाई तब, उन्होंने यहाँ की जड़ों में बदलाव नहीं किया, उन्होंने उनके मस्तिष्क में एक प्रकार से ग्राफ्टिंग कर दी। इस ग्राफ्टिंग का प्रभाव ये हुआ कि जड़ों से तो हम अपनी परंपरा से जुड़े हैं, पर हमारा ऊपरी भाग उसका विरोधी हो गया।
इस आधुनिक शिक्षा के चलते भ्रम का ऐसा जाल बिछा हुआ है कि युवा वर्ग अपने आप को अपनी संस्कृति से जोड़ने का प्रयास भी नहीं करता। उसके लिए धर्म और कर्म जैसे कार्य बुज़ुर्गों के लिए ही बने हैं। धार्मिक ग्रंथों और अपने इतिहास को जानने का वे प्रयास भी नहीं करते। उन्हें जूलियस सीज़र का इतिहास पता है, उन्हें नेपोलियन का इतिहास पता है, पर अपना इतिहास शून्य है।
"एक स्वर सहस्त्र प्रतिध्वनियाँ" पुस्तक में साकेत जी ने इस भ्रम के जाल को हटाने का प्रयास किया है। इस पुस्तक में ११ छोटी छोटी कथाएँ हैं, जो युवा वर्ग को उनकी संस्कृति से जोड़ने में सहायक होंगी। इन कथाओं में आपको भारतीय संस्कृति के वे स्वर सुनाई देते हैं जिनकी प्रतिध्वनियाँ प्रत्येक युग में सुनने को मिलते रहेंगे, बस ज्योति जलाने वाले हाथ चलते रहें।