दिग्विजय [Digvijaya] by गुरुदत्तMy rating: 5 of 5 stars
भगवान आदि शंकराचार्य जी ने पवित्र भारत भूमि के चारों दिशाओं की यात्रा कर वहाँ स्थापित मतों को जिनमें समय के कारण कुछ दूषण आ गए थे, उन्हें अपने ज्ञान से दूषण मुक्त कर दिग्विजय किया। इसी दिग्विजय की पृष्ठभूमि में है भारतीय समाज जिसकी भिन्न भिन्न समस्याएँ हैं, समाज जो गृहस्थ है, समाज जो पुरोहित है, समाज जो विचारक है। इस समाज में समय के कारण कई धारणाएँ बन जाती हैं, यदि उन्हें सही मार्गदर्शन नहीं प्राप्त होता, तो यही धारणाएँ कभी कभी मानव विरोधी भी हो जाती हैं। ऐसे में आदि शंकराचार्य जैसी पुण्य आत्माओं का महत्त्व और भी बढ़ जाता है, जो समय समय पर भारत भूमि में प्रकट होकर समाज का मार्गदर्शन करतीं हैं।
आदि शंकराचार्य जी की दिग्विजय यात्रा पर आधारित ये उपन्यास ऐसे ही एक समाज पृष्ठभूमि पर केंद्रित है। जहाँ समाज की विभिन्न समस्याओं पर तथा पंडितों और आचार्यों की संसार को लेकर जो विचार हैं, उनके विभिन्न पहलुओं पर आदि शंकराचार्य के विचारों को रखा गया है। उनकी दिग्विजय किन अर्थों में समाज उपयोगी और उनकी मार्गदर्शिका है, यही इस पुस्तक का मूल है।
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