मंगलवार, 4 नवंबर 2025

पुस्तक - दिग्विजय : गुरुदत्त

दिग्विजय [Digvijaya]दिग्विजय [Digvijaya] by गुरुदत्त
My rating: 5 of 5 stars

भगवान आदि शंकराचार्य जी ने पवित्र भारत भूमि के चारों दिशाओं की यात्रा कर वहाँ स्थापित मतों को जिनमें समय के कारण कुछ दूषण आ गए थे, उन्हें अपने ज्ञान से दूषण मुक्त कर दिग्विजय किया। इसी दिग्विजय की पृष्ठभूमि में है भारतीय समाज जिसकी भिन्न भिन्न समस्याएँ हैं, समाज जो गृहस्थ है, समाज जो पुरोहित है, समाज जो विचारक है। इस समाज में समय के कारण कई धारणाएँ बन जाती हैं, यदि उन्हें सही मार्गदर्शन नहीं प्राप्त होता, तो यही धारणाएँ कभी कभी मानव विरोधी भी हो जाती हैं। ऐसे में आदि शंकराचार्य जैसी पुण्य आत्माओं का महत्त्व और भी बढ़ जाता है, जो समय समय पर भारत भूमि में प्रकट होकर समाज का मार्गदर्शन करतीं हैं।

आदि शंकराचार्य जी की दिग्विजय यात्रा पर आधारित ये उपन्यास ऐसे ही एक समाज पृष्ठभूमि पर केंद्रित है। जहाँ समाज की विभिन्न समस्याओं पर तथा पंडितों और आचार्यों की संसार को लेकर जो विचार हैं, उनके विभिन्न पहलुओं पर आदि शंकराचार्य के विचारों को रखा गया है। उनकी दिग्विजय किन अर्थों में समाज उपयोगी और उनकी मार्गदर्शिका है, यही इस पुस्तक का मूल है।

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मंगलवार, 25 फ़रवरी 2025

भारत पर आक्रमण



ईसा के आरंभ से पहले से आक्रांताओं के हमले हो रहे थे भारत पर लगातार। सैन्य शक्ति का लगातार ह्रास हो रहा था। ७०० में इस्लाम के आगमन के बाद उन्होंने धर्म परिवर्तन वाली नीति को बढ़ावा दिया, जिससे उनकी सैन्य शक्ति तो लगातार चहुं दिशा में बढ़ रही थी, आपकी कम होती जा रही थी। 

एक स्थायीत्व की आवश्यकता उस समय थी और वो अकबर और राजा भारमल द्वारा की गयी संधि से प्राप्त हुआ। अकबर को भी राजपूतों की सहायता की आवश्यकता थी क्योंकि उज़्बेक, अफ़ग़ान सत्ता से उसे लगातार चुनौती मिल रही थी। 

अफ़गानों को रोकने के लिए मुग़ल और राजपूत दोनों की संयुक्त शक्ति की उसे ज़रूरत थी। इस कारण मुग़ल किसी भी शर्त पर राजपूतों के साथ संधि करने को तैयार थे। दोनों को ही एक दूसरे की ज़रूरत थी। इसलिए मेरे अनुसार तो वह भारत के लिए सबसे योग्य समय था जिसने इस्लाम गति को कुछ समय के लिए रोक दिया। 

बाक़ी हम आधुनिक युग में भी देख चुके हैं, जब हमें पाकिस्तान और बांग्लादेश को भारत से अलग करना पड़ा। वो युद्ध न रूकते तो ये दशा इससे भी बद्दतर होती।

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2025

Rose Day



न जाने कितनी चादरें ओढ़ रखीं है इस ग़ुलाब ने,

हर चादर के भीतर से एक नई मुस्कान निकलती है। 

मेरे मन में बसे ग़ुलाब को ये नई मुस्कान लुभाती है, 

और एक मुस्कान लिये वो मेरे होंठों पे आ जाती है।। 



ऐ मेरे ग़मले के ग़ुलाब, आज वह दिन आ गया है जब तुझे प्रतिदिन दिए जाने वाले जल का कर्ज़ उतारना है। मेरा प्रेम संदेश लेकर मेरे मेहबूब के पास जा और उनसे मेरा प्रेम निवेदन कह, उनसे कहना कि उनकी यादों में रातें न करवट बदल रही और न आँखें झपक रहीं। बस एक टक उनकी याद में साँसे थाम रखीं हैं, ये प्रेम निवेदन स्वीकार न हुआ तो ये साँसे रुक जाएंगी। 

सोशल मीडिया पर बढ़ती अश्लीलता का कारण क्या है ?



आज सरकार क़ानूनी डंडा लेकर कुछ यूट्यूबर्स के पीछे पिल पड़ी है। पर किसी मंच से इस तरह का कंटेंट परोसा जा रहा है, तो उसके लिए ज़िम्मेदार कौन है ?? 
जो आज डंडा लेकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मापने निकल पड़े हैं, उन्होंने समाज में नैतिक मूल्यों को बढ़ाने के लिए कौन से कार्य किए हैं ?? 
आज अधिकतर युवा समय रैना, इलाहाबादियों जैसों के कंटेंट को फॉलो कर रहे हैं तो उसके लिए जिम्मेदारी किसकी तय होती है ?? 
युवाओं के पास विकल्प क्या हैं ? शहरों में मैदान ?? अब तो गांव में भी अतिक्रमण होने लगा है, उधर भी नहीं बचे।

पुस्तकालय ?? संविधान के किसी अनुच्छेद में शायद हर ज़िले में पुस्तकालयों का प्रावधान है ?? कितने जिलों में हैं पुस्तकालय ?? 

जब युवाओं को विकल्प ही कमरों में एकांत में रहने का दोगे तो वो एकांत में वही सुनेंगे और वही करेंगे जो उन्हें भाएगा। बंद कमरों में जीवन काटने को मजबूर युवाओं के लिए जो थोड़े बहुत विकल्प हैं वो यहीं हैं। 

अधिकतर युवा जो यूट्यूबर हैं, वो घर से बहुत कम बाहर निकलते हैं। बंद कमरों के विचार हैं, जिन्होंने राक्षसी स्वरूप ग्रहण किया है। सरकार को डंडा लेकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मापने के स्थान पर विकल्पों पर कार्य करना चाहिए। 

ग़लती तुम्हारी और भुगते युवा, ये तो न्याय नहीं हुआ।

गुरुवार, 16 जनवरी 2025

पुस्तक समीक्षा - कुल्हड़ भर इश्क

Kulhad Bhar Ishq: Kashishq (Hindi Edition)Kulhad Bhar Ishq: Kashishq by Koshlendra Mishra
My rating: 4 of 5 stars

ठीक ठाक शब्दों का इश्क

हिसाब से लिखे गए शब्दों का उफान मारता इश्क है, जो खुशनुमा वातावरण का अहसास करवाता हैI कोई ऐसा मोड़ नहीं जहाँ जीवन ऐसा लगे की प्रेम छूट रहा और प्रेमी युगल आंसुओं की धारा में बहे जा रहे हैं। नमिला जुलाकर ठीक-ठाक इश्क की शृंखला में कुल्हड़ भर इश्क घुल जाता है।

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पुस्तक समीक्षा - चाँदपुर की चंदा

 

Chandpur Ki Chanda । चाँदपुर की चंदाChandpur Ki Chanda । चाँदपुर की चंदा by Atul Kumar Rai
My rating: 5 of 5 stars

ग्राम जिसमें एक समाज रहता है, उस समाज के युवा जब राजनीति के शिकार होकर दिशाहीन होते हैं; तब गांव में खिलते पुष्पों का जीवन दूभर हो जाता है। एक ऐसे ही ग्रामीण जीवन में खिलते प्रेम की कथा है "चाँदपुर की चंदा"।

समाज जिसे मानव सभ्यता का आधार माना गया था, जिसका कार्य था एक दूसरे के सुख दुख में साथ निभाना। जब वही समाज एक दूसरे को सुखी देख जलने भुनने लगे तब दूषित हो उठता है।

अपनी राजनीति को चमकाने में लगे युवा नेता, जब गांव के युवाओं को नशे में डुबाने लगें, तब उस गांव का दम घुटने लगता है।

इस तरह का माहौल आज हर गांव का है। ऐसे ही गांव में जब दो युवाओं के हृदय में प्रेम के पुष्प खिलते हैं, तो बदनाम करने वाली सहस्त्रों आवाज़ गूंजने लगती हैं।

चंदा के हृदय में भी शशि के लिए प्रेम जागा है। पर उसने गांव की बेटियों को दहेज़ के बोझ में झुलसते भी देखा है। वह चाहती है गांव की बेटियों को पढ़ाना, उन्हें सशक्त बनाना।

इसी चाह और हृदय की गांठ को सुलझाती कहानी है, चंदा की।

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रविवार, 16 अक्टूबर 2022

पुस्तक समीक्षा

यात्रा वृतांत हो, कोई प्रसंग सुनाना हो या कथा कहने का गुण हो, तृषार जी अपनी प्रतिभा से अचंभित हुए बिना नहीं रहा जाता। उनकी कथा कहने की जो शैली है वह पाठकों को कथा के साथ बांधे रखती है।

किसी गांव की कच्ची सड़क पर रात के सन्नाटे में निकलने का पूरा दृश्य जिस तरह उन्होंने अपनी कथा में बताया है, उसकी अनुभूति आपको होने लगती है।

कथा एक ऐसा रोमांच उत्पन्न करती है जिसका रहस्य जानने के लिए हम नायक के साथ साथ चलते जाते हैं। जब रहस्य प्रकट होता है तो हमें यह ज्ञात होता है कि कैसे अतीत के काले साये आज भी हमें अपनी सत्ता से दबाए हुए हैं।

अतीत में जिन्हें अत्याचार के बल से छीना था, उन संसाधनों पर आज भी वह अतीत किसी साये के रूप में अपना कब्ज़ा जमाए हुए है।

कथा केवल रोमांच और रहस्य ही होकर नहीं गुजरती है, वह उस सच्चाई से भी परिचय करवाती है, जो हमारे सामने वर्तमान में समस्या बनकर खड़ी है।

पढ़िए एक छोटा सा कथानक है, आपको पढ़कर अच्छा लगेगा।

पुस्तक - दिग्विजय : गुरुदत्त

दिग्विजय [Digvijaya] by गुरुदत्त My rating: 5 of 5 stars भगवान आदि शंकराचार्य जी ने पवित्र भारत भूमि के चारों दिशाओं की यात्रा कर वहाँ स्...