गुरुवार, 7 जुलाई 2022

उसने कहा था - पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी


ये २४ पन्ने की बहुत छोटी सी कहानी है, पर इसमें जो प्रेम कथा है, वह सर्वश्रेष्ठ है। पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी जी ने अपने छोटे से जीवन में चंद ही कहानियां लिखीं, और हिन्दी कहानी लेखन में उनकी कहानियों को ही शायद प्रथम कहानी के रूप में समीक्षकों ने जगह दी है।

कई समीक्षकों ने इनकी कहानियों की समीक्षा लिखी और आलोचना भी, इनकी कहानियों को हिन्दी साहित्य जगत में एक अग्रिम स्थान प्राप्त हुआ है। २०१४ के वर्ष में इस कहानी (उसने कहा था) ने १०० वर्ष पूरे किए हैं।

अमृतसर शहर में उस समय गाड़ी इक्कोवालों का शोर अधिक सुनाई पड़ता था, अब बड़ी बड़ी मोटरकार आ गईं हैं सड़कों पर। गाड़ी-इक्कोवाली भीड़ से सड़क पार कर एक लड़की और लड़का चौक की दुकान पर आ मिले, दोनों शायद छुट्टियों में मामा के घर आये थे।

उस दुकान का मालिक किसी अन्य ग्राहक के साथ व्यस्त था, तब इन दोनों बच्चों को जिसमें लड़के की उम्र १२ है और लड़की ८ वर्ष की है, बात करने का समय मिल जाता है। सौदा लेने के बाद चलते समय लड़का लड़की से पूछता है, 'तेरी कुड़माई हो गयी' , और लड़की 'धत्त' कहती हुई भाग जाती है।

ऐसे ही कभी दूध की दुकान पर तो कभी किसी सब्जी वाले के यहाँ वह मिल जाते तो लड़का यही सवाल पूछता लड़की से, 'तेरी कुड़माई हो गयी' और लड़की धत्त बोलकर भाग जाती।

एक दिन लड़की ने लड़के की संभावना के विरुद्ध कहा - 'हाँ हो गई।' 'कब' 'कल; देखते नहीं यह रेशम से कढ़ा हुआ सालू।' लड़की भाग गई।

लड़के ने भी घर की राह पकड़ी, पर उसके मन में कई उधेड़बुन चल रही थीं, उसी में उसने एक कुत्ते को पत्थर मारा, एक लड़के को मोरी में ढकेल दिया। सामने नहाकर आती हुई किसी वैष्णवी से टकराकर अंधे की उपाधि पाई। तब जाकर कहीं घर पहुँचा।

बड़ा होने पर लड़का फ़ौज में भरती हो जाता है, प्रथम विश्व युद्ध छिड़ जाने से उसकी पलटन को जर्मन फ़ौज से लोहा लेने के लिए विदेश में कहीं भेजा गया है। वह कहता है यहाँ लुधियाना से दस गुना अधिक गलन है, इससे अंदाज़ा मिलता है किसी ठंडे प्रदेश में उनकी पलटन जंग में डटी है।

युद्ध में जिस समय वह आ रहा था, तब संयोग से उसी लड़की से उसकी मुलाक़ात होती है, अब वह किसी की औरत है, उसका पति और लड़का भी इस लड़के के साथ उसी पलटन में जंग के लिए जा रहे हैं। इस समय लड़की इस लड़के से कुछ कहती है, और उसी वचन को निभाते हुए ये लड़का जंग को चला जाता है।

'उसने कहा था' , बचपन में जिस लड़की से वह मिला था और फिर कई वर्षों तक उसने कभी उसे नहीं देखा आज जंग के मैदान में उसे वह याद आ जाती है। जंग में वह घायल हो जाता है और अपनी अंतिम सांस ले रहा है, पर उसे इस बात की संतुष्टि है कि उसने उसे दिए वचन को पूरा किया।


मंगलवार, 5 जुलाई 2022

The Coalition Years - Pranab Mukherjee

भारतीय राजनीती के कुछ अनमोल संस्मरणों को प्रणब मुख़र्जी जी ने अपनी लेखनी से संवारा है। राष्ट्रपति भवन में प्रवेश करते हुए, उन्हें याद आते हैं भारत की राजनीति में बिताये वो ४६ वर्ष जिनका आरंभ फरवरी १९६६ से हुआ था। अपने कार्यकाल को याद करते हुए उन्हें गर्व होता है कि एक साधारण गांव का लड़का जो कभी तेल के दिये की रोशनी में जीता था, आज एक ऐसे भवन में प्रवेश कर रहा है जहाँ कई रोशनी के झूमर जगमगा रहे हैं। अपने जीवन के इन अनमोल पलों को याद करते हुए वे लिखते हैं कि, ये भारत के संविधान की शक्ति ही है जो एक साधारण से व्यक्ति को भी राष्ट्र का सबसे प्रभावशाली व्यक्ति बना सकता है।

"My Entry into Rashtrapati Bhavan on the afternoon of 25 July 2012 marked the end of my 46 year old political career which began in February 1966. It had indeed been a long and arduous journey."

"I also mentioned that the rise of a village boy from flickering oil lamps in an obscure village, to the blazing chandeliers of the high dome of Raisina Hill, symbolizes the strength of Indian Democracy and its pervasiveness."

The Coalition Years, भारतीय राजनीति में आया वह दौर है जब गठबंधन से सरकारें चलना आरंभ हुआ। इसमें प्रणब दा १९९६ से २०१२ तक की राजनीति के प्रमुख घटनाक्रमों का वर्णन करते हैं। यही वह वर्ष हैं जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का प्रवेश भारतीय राजनीती में आरंभ हुआ। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने १९९८ से २०१४ तक अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व में एक सफ़ल गठबंधन की सरकार चलाकर ये सिद्ध कर दिया कि गठबंधन के बल पर भी सफ़ल सरकार चलायी जा सकती है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का आरंभ २००४ के चुनावों से आरंभ हुआ और इसने १० वर्ष तक एक सफ़ल सरकार केंद्र को दी।

संयुक्त प्रतिशील गठबंधन की सरकार में प्रणब मुख़र्जी जी ने रक्षा मंत्री,वित्त मंत्री और विदेश मंत्री के रूप में अपनी सेवायें दीं। रक्षा, वित्त एवं विदेश मंत्री के रूप में जो कार्यकाल प्रणब दा ने संभाला, उन्हीं संस्मरणों को उन्होंने इस पुस्तक में शब्दरूप किया है। राष्ट्र राजनीति में प्रभावशाली पदों पर रहकर उन्होंने कई महत्वपूर्ण योजनाओं पर कार्य किया, और उन्हें अपने परिश्रम से पूर्ण किया। आधार पहचान पत्र, वस्तु एवं सेवा कर (GST), लोकपाल इत्यादि जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं को उन्होंने संसद में चर्चा में लाया और उनपर कार्य किया। इन्हीं सब कार्यों के संस्मरणों को इन्होंने इस पुस्तक में लिखा है, जो भारतीय राजनितिक इतिहास को जानने और समझने के लिए एक महत्वपूर्ण दस्ताबेज का रूप दिया है।

शनिवार, 2 जुलाई 2022

गुनाहों का देवता - धर्मवीर भारती

गुनाहों का देवतागुनाहों का देवता by Dharamvir Bharati
My rating: 5 of 5 stars

इस उपन्यास में सब कुछ है, वेदना है, दर्द है, प्यार है, हसी है सब है एक सम्पूर्ण उपन्यास है. प्रेम की गहराहियों तक जाके छूकर निकल गए हैं धर्मवीर भारती इस उपन्यास द्वारा. प्रेम साधना और भोग साधना का संतुलन जिस तरह से प्रस्तुत किया है, बहुत ही उत्तम है. पम्मी का पत्र में उसने पूरा जीवन जी लिया है. कहानी का हर पात्र, खुद को समझने और समझाने की कोशिश कर रहा है.

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कंकाल - जयशंकर प्रसाद

kankaalkankaal by Jayshankar Prashad
My rating: 5 of 5 stars

एक अंतर द्वन्द जो सबके भीतर चलता है, सही और ग़लत का। धर्म और सामाज में आ रहे बदलाव को लेकर सबके भीतर ये चेतना जागती है और उसे सही और ग़लत के बीच चुनाव करना होता है। हमारे कई लेखक इसी ध्वंध को लेकर अपने विचार लिख कर प्रकट करते हैं। जयशंकर प्रसाद जी का ये उपन्यास भी उसी ध्वंध को लेकर है जो उनके भीतर चल रहा है, धर्म के मूल भाव को वो समझने की कोशिश करते हैं, जहां वो धर्म के भीतर मानव द्वारा सामाजिक बुराईयों का विरोध करते हुए भी नज़र आते हैं , और उनका बचाव करते हुए भी। इसी विरोध और बचाव का मिला जुला प्रयोग है 'कंकाल' ...... 😑😑

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सौन्दर्य की नदी नर्मदा - अमृतलाल वेगड़

Saundaryani Nadi NarmadaSaundaryani Nadi Narmada by Amritlal Vegad
My rating: 5 of 5 stars

जिस सुंदरता से वेगड जी ने नर्मदा नदी के प्रपात,घाटी और अपनी नर्मदा नदी के साथ साथ की यात्रा का वर्णन किया है उसे पढ़ते हूये यही लग रहा था उठकर नर्मदा की परिक्रमा करने चल पडुं। राह में जितने ग्राम पड़े उन सब का भी सुंदर वर्णन है, और शूलपाण की झाड़ियों व वहाँ के भीलों की भी जानकारी प्राप्त होती है।

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बाग़ी बलिया - सत्या व्यास

Baaghi Ballia । बाग़ी बलिया

सत्य व्यास की क़िताब का इंतज़ार रहता ही है, ये चौथी पुस्तक भी ३ बैठकों में पढ़ लिए, बहुत अच्छा लिखतें हैं । दिल्ली दरबार की प्रेम कहानी हो या बनारस टॉकीज का छात्र जीवन या फ़िर ८४ के सिख विरोधी दंगों में बन रही प्रेम कहानी। ये कहानी भी बनारस टॉकीज की तरह छात्र जीवन पर है, पर यहाँ परीक्षा या सत्रीय कार्य पूरा करने का होड़ नहीं हैं, यहाँ वोट की गिनती बढ़ाने का होड़ है। ये कहानी छात्र जीवन में उठती राजनैतिक उत्कंठा और उसे पूरे मुक़ाम पर पहुँचाने की दौड़ है। ये कहानी दो मित्रों की भी है, जो मित्र कम और भाई ज़्यादा हैं और उनकी एक छोटी बहन है। प्रेम भी है और रंजिश भी है, छात्र जीवन की राजनीति में क्या क्या घटित होता है उसका चित्रण भी है।

एक ऐसा विश्विद्यालय जिसकी राजनीति राज्य की राजनीति तय करतीं हों तो वहाँ की उठक पटक भी उसी लेवल की होगी जिस तरह राज्य के किसी विधायकी के चुनाव के समय होती है। इस कहानी को पढ़कर अब अगली कहानी का भी इंतेज़ार रहेगा।

एकलिंग का दीवान - मनु शर्मा

                                                       एकलिंग का दीवान

शर्मा जी ने एक इतिहास को बड़ी शुद्धता से कहानी का रूप दिया है, और बप्पा रावल के बचपन से उनके राजतिलक तक का पूरा दृश्य इस कथा में उतार दिया है. ईडर की महारानी ने बड़े विश्वास से अपने पुत्र की रक्षा का भार अपनी सबसे विश्वासी और प्रिय सखी व् दासी तारा को दिया, तारा ने भी अपने कर्तव्यों का निष्ठा के साथ और पूरी ईमानदारी से पालन किया. वहीँ राज्यपुरोहित सत्यनारायण ने भी स्वामिभक्ति दिखाते हुये महाराज महेंद्र के पुत्र भोज को राज्य से सुरक्षित बहार निकालने का कार्य पूरी श्रद्धा से किया, और वर्षों तक इस राज को राज्य के सरदार से छिपाये रखा. भीलों के बलिदान और माटी प्रेम को भी कथा में दर्शाया गया है, जब तारा जंगलों में भटकती हुई एक ग्राम के पास पहुँची तब एक भील जो अपनी भेड़ ख़ोज रहा था. तारा ने उसे अपनी दशा बताई और सहायता की मांग की, भील ने तारा की जान के जोख़िम पर भी सहायता की, और उसे अगली सुबह भीलों के सरदार से मिलवाकर सारी बात बता दी. यहाँ से तारा, भोज और उस भील सरदार जादव की यात्रा शुरू होती है, और कैसे कैसे और किन किन कठिनाईयों को झेलकर वे भोज की रक्षा करते हुये उसे बड़ा होते देखते हैं. भोज कुछ बड़ा होने पर गाय चराने का काम करता है, और उसी से प्राप्त आय से जीवन गुजर चला रहा है, साथ में उसकी माँ तारा भी है. जब भोज बड़ा हो जाता है तब राजपुरोहित सत्यनारायण उनसे मिलने आते हैं, और फिर भोज के राज्याभिषेक की तैयारी में जुट जाते हैं. इसी बीच एक दिन भोज हरित मुनि के आश्रम पहुँच जाता है, वहीँ कुछ समय पश्चात बड़ी धूम से उसका यज्ञोपवित होता है और उसे 'एकलिंग का दीवान' की उपाधि प्राप्त होती है. अंत में कूटनीति व् राजनीती कर राजपुरोहित उसका चित्तोड़ की गद्दी पर उसका राज्याभिषेक करते हैं, व प्रजा में उसे 'बप्पा रावल' पिता तुल्य बनाते हैं.

चित्रलेखा - भगवतीचरण वर्मा

चित्रलेखाचित्रलेखा by Bhagwaticharan Verma
My rating: 4 of 5 stars

प्रश्न होता है - पाप क्या है? , गुरु अपने शिष्यों को लेकर संसार के दो अलग अलग क्षेत्र में जाता है, एक अनुराग का और विषय-भोग का क्षेत्र है जहाँ मदिरा से रत सामंत उनका स्वागत करता है, गुरु अपने एक शिष्य को वहां छोड़ते और आगे बढ़ जाते हैं.
दुसरे शिष्य को लेकर वे एक ऐसे क्षेत्र में आते हैं जहाँ विराग है, भोग का कोई स्थान नहीं है और वहां उसे विरागी जीवन जीने को छोड़ वे अपने क्षेत्र वापस आ जाते हैं.
दोनों शिष्य अपने अपने क्षेत्र का अनुभव कर वर्ष बाद अपने गुरु से भेंट करते हैं, और अपने अपने तरह से पाप क्या है?, उसका उत्तर देते हैं. गुरु अंत में उन्हें पाप और पुण्य का भेद बतलाते हैं.

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जय सोमनाथ - कन्हैयालाल मानेकलाल मुंशी

जय सोमनाथ
सोमनाथ मंदिर पर ग़ज़नवी का हमला बहुत से इतिहासकारों द्वारा शोध का विषय रहा है, जहाँ कुछ का मानना है कि राजपूत योद्धाओं ने ग़ज़नवी के अमीर की सेना से भय के कारण अपने गढ़ छोड़ दिये और किसी सुरक्षित जग़ह जाकर सरण ले ली, वहीं मुंशी जी 'जय सोमनाथ' में ये दावा किया है कि महमूद को मार्ग में बहुत से राजपूतीं तलवारों का सामना करने मिला। लोहकोट, मुलतान, सपादलक्ष और घोघगढ़ के मार्ग में उसे दिक्कतें आयीं, जहाँ लोहकोट और मुलतान सहजता से गज़नी के आधीन हो गए वहीं सपादलक्ष और घोघागढ़ में सेना का सामना करना पड़ा।
घोघागढ़ के सामने जब मुहमद की सेना पहुँची, तो उसने उस गढ़ को जीतने में समय की बर्बादी समझी क्योंकि उसे जल्द से जल्द प्रभास पाटण पहुँचना था। पर घोघागढ़ का चौहान इतनी सहजता से उसे वहाँ से निकलने नहीं देना चाहते थे, क्योंकि सोमनाथ के पिणाकपाणी उसके आराध्य देव थे, और आमीर उनके आराध्य को लूटने और मंदिर ध्वस्त करने सेना लेकर जा रहा था। घोघगढ़ में आठ सौ राजपूत थे, तीन सौ दूसरे और सात सौ स्त्रियां, घोघा चौहान ने उन्हीं आठ सौ राजपूतों और अन्य को लेकर साका करने की ठानी और लाखों की आमीर की सेना पर टूट पड़ा, एक - एक राजपूत ने पाँच पाँच मलेक्ष् मारे, और अंत में वीरगति को प्राप्त हुए। वहाँ घोघा चौहान को वीरगति प्राप्त करते देख महल की स्त्रियों ने भी जौहर किया, और कैलाश को प्राप्त हुईं।
दूसरी तरफ़ जब आमीर की सेना रेगिस्तान में प्रभास का मार्ग ख़ोज रही थी, तो उन्हें घोघा चौहान का बेटा सज्जन चौहान मिला जिसने आमीर की सेना को रेगिस्तान में भटका दिया, और उस रेत के बबंडर में आमीर की सेना का एक दस्ता धूल में दब गया, लगभग है, हज़ारों की सेना को धूल में गढ़ा छोड़कर गज़नी के आमीर ने जैसे तैसे अपनी जान बचाई। वहीं सज्जन चौहान भी उसी रेत में दब गया। उसके बाद लोगों ने वहां घोघा चौहान के भूत को सोमनाथ की ओर जाते देखा और घोघाबापा के भूत की अफवाह गांव गांव फैलने लगी।
आमीर की सेना रेगिस्तान के तूफ़ान से जो बच निकली वो ज़ल्दी से ज़ल्दी प्रभास की ओर बढ़ने लगी, मार्ग में पाटण को ध्वस्त करती हुई वह प्रभास के मुखाने आ खड़ी हुई, वहां उसे पाटण के महाराज भीमदेव की तीरंदाजों का सामना करना पड़ा। पहले दिन का युद्ध भीमदेव के पाले में रहा, दूसरे दिन आमीर की सेना कोई मौका नहीं छोड़ रही थी और आमीर भी सामने बढ़कर उनका नेतृत्व कर रहा था। वहीं एक गद्दार के कारण आमीर की सेना को सोमनाथ के गुप्त मार्ग का पता चल गया और वे सोमनाथ के भीतर घुस आये, और उस दिन की लड़ाई में भीमदेव घायल हुआ व आबू का परमार मारा गया और लाट के राय भी कैलाश को प्राप्त हुये। आमीर ने मंदिर के मुख्य पुजारी का शीस धड़ से उड़ा दिया और गदा के वार से ज्योतिर्लिंग के टुकड़े कर दिए।
घायल भीम को सामंत चौहन जो सज्जन चौहान का पुत्र और घोघाबापा का पौत्र था वहां से निकाल कर खम्बात ले आया, और वहां घायल भीम का स्वास्थ्य ठीक होने पर उन्होंने पुनः आमीर पर हमला किया, और इस बार थकी हुई आमीर की सेना रेगिस्तान के मार्ग से भाग खड़ी हुई। भीमदेव ने पुनः प्रभास पाटण का निर्माण करवाया और इस बार भव्यतम सोमनाथ मंदिर का निर्माण किया।
वहीं कहानी में आमीर के हमला करने से पहले के सोमनाथ का दृश्य भी है जहां नर्तकियों का जीवन है उनके रहन सहन और मंदिर प्रांगण में नृत्य करने का चित्र भी है। उन्हीं नर्तकियों में चौला भी है और उसकी माँ गंगा भी, गंगा नर्तकियों की मुखिया है और नृत्य और संगीत की छोटी से छोटी बारीकियों की उसे पहचान है। चौला भगवान भोलेनाथ को रिझाने के लिए ही नृत्य करना चाहती है।
मंदिर में बहुत सी कुप्रथाओं का भी प्रपंच था जिन्हें लेकर मंदिर के मुख्य पुजारी गंग सर्वज्ञ भी चिंतित रहा करते थे। इन्हीं सब की और मुंशी जी ध्यान आकृष्ट करते हैं और कहानी कहते चलते हैं।

दिवास्वप्न - गिजुभाई बधेका

Divasvapna : An Educator's ReverieDivasvapna : An Educator's Reverie by Gijubhai Badheka
My rating: 5 of 5 stars

प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में गिजुभाई बधेका जी के प्रयोगों ने क्रांति को जन्म दिया और शिक्षा के क्षेत्र में कई बदलाव देखने को मिले. गिजुभाई बधेका जी के उन्हीं प्रयोगों का लिखित रूप है ये पुस्तक. किस्से-कहानी और खेल के प्रयोगों से शिक्षा में बहुत से उनके प्रयोग इस पुस्तक में दर्ज़ हैं. एक शिक्षक के लिए अमूल्य पुस्तक ......

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अक्षरों के साये - अमृता प्रीतम

अक्षरों के साये [Aksharon Ke Saye]अक्षरों के साये [Aksharon Ke Saye] by Amrita Pritam
My rating: 3 of 5 stars

शब्दों में जादू सा कुछ है ....

जीवन के कुछ अध्यायों और अनुभवों को यहाँ साझा किया है, कुछ कविताएँ हैं ,कुछ शायरियाँ और बहुत कुछ जीवन का फ़लसफ़ा जो मन के भीतर ही भीतर जन्म लेता रहता है, पर कहने को शब्द नहीं मिलते। जीवन के उन छिपे हुए फलसफों को भीतर से निकालकर शब्द देने का प्रयत्न किया है।

भाषा शैली इतनी सुंदर है, कि एक बार पढ़ना आरम्भ करेंगे तो पढ़ते हुए उसमें खो जाएंगे।

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अतरापी - ध्रुव भट्ट

अनुभव अथवा शिक्षित ज्ञान एक जीवन में क्या अधिक महत्वपूर्ण है। इस कहानी में दो श्वान भाई हैं एक को जीवन स्वयं के अनुभव और बिना किसी बंधन में बंधे अपने अनुसार जीना है। दूसरा शिक्षा ग्रहण कर अपने जाति भाइयों को भी शिक्षित कर उनका उद्धार करना चाहता है। दोनों ही अपने अपने मार्ग में श्रेष्ठ पद ग्रहण करते हैं, जहाँ छोटा भाई किसी संबंध से स्वयं को नहीं बांधता फ़िर भी संबंधों में बंधता चला जाता है। वहीं बड़ा भाई जो शिक्षित और प्रतिष्ठित गुरु के सानिध्य में रहा है वह संबंधों में रहकर भी किसी से श्रेष्ठ संबंध में नहीं बंध पाता। जीवन किस मार्ग पर चलकर जीना है ऐसे अनेक मन में उठते सवालों का शाब्दिक रूप है ये पुस्तक, जो जिज्ञासा और अनुभव दोनों का ही ज्ञान देता है।

पचपन खम्भे लाल दीवारें - उषा प्रियम्वदा



दिन की थकान लिए भारी हुए कंधे, शाम को एक साथी की चाह रखते ही हैं, जो उन्हें संभाल सके।  जीवन की भागदौड़ में जब वह साथी नहीं मिलता, तब जीवन का सूनापन आपको परेशान करने लगता है। पुस्तक पचपन खम्भे लाल दीवारें की नायिका का जीवन भी कुछ कुछ ऐसी ही चाह रखता है, जिनके कंधों पर छोटी उम्र में ही परिवार की ज़िम्मेदारी का भार आ गया है। 

ज़िम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए नायिका एक उम्र पार कर जाती है, वह उम्र जो स्वतंत्र और स्वच्छंद होती है और साथी चुनने में सहायक होती है। अब नायिका उस उम्र में पहुँच चुकीं हैं जहाँ साथी की कमी उन्हें महसूस होने लगी है। शाम को आंगन में बैठ कर मार्ग में पड़ने वाले पचपन खम्भों को वो अपने आंगन से गिन सकतीं हैं, साथ ही उनकी रोशनी में हॉस्टल की लाल दीवारें चमकने लगतीं हैं। यही पचपन खम्भे और लाल दीवारें उनके शाम के साथी हैं।

 जब सब परेशानियों से निकाल ले जाने के लिए एक साथी उनके जीवन में आ जाता है, तब परिवार का ख्याल कर और समाज का ख्याल कर वो अपने पैर पीछे खींच लेतीं हैं। जीवन के अकेलेपन को और आपके अकेलेपन पर निरंतर पड़ती समाज की दृष्टी को पुस्तक में समेटने का प्रयास किया गया है। 

शीर्षक पचपन खम्भे लाल दीवारें ठीक ही लगता है, जब ये इस बात के सूचक हैं कि जीवन कितना एकाकी है जो दीवारों पर पड़ती रोशनी और मार्ग पर पड़ते खम्भों को देखने में बीत रहा है।

 

पुस्तक - दिग्विजय : गुरुदत्त

दिग्विजय [Digvijaya] by गुरुदत्त My rating: 5 of 5 stars भगवान आदि शंकराचार्य जी ने पवित्र भारत भूमि के चारों दिशाओं की यात्रा कर वहाँ स्...