शनिवार, 2 जुलाई 2022

कंकाल - जयशंकर प्रसाद

kankaalkankaal by Jayshankar Prashad
My rating: 5 of 5 stars

एक अंतर द्वन्द जो सबके भीतर चलता है, सही और ग़लत का। धर्म और सामाज में आ रहे बदलाव को लेकर सबके भीतर ये चेतना जागती है और उसे सही और ग़लत के बीच चुनाव करना होता है। हमारे कई लेखक इसी ध्वंध को लेकर अपने विचार लिख कर प्रकट करते हैं। जयशंकर प्रसाद जी का ये उपन्यास भी उसी ध्वंध को लेकर है जो उनके भीतर चल रहा है, धर्म के मूल भाव को वो समझने की कोशिश करते हैं, जहां वो धर्म के भीतर मानव द्वारा सामाजिक बुराईयों का विरोध करते हुए भी नज़र आते हैं , और उनका बचाव करते हुए भी। इसी विरोध और बचाव का मिला जुला प्रयोग है 'कंकाल' ...... 😑😑

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