शनिवार, 2 जुलाई 2022

जय सोमनाथ - कन्हैयालाल मानेकलाल मुंशी

जय सोमनाथ
सोमनाथ मंदिर पर ग़ज़नवी का हमला बहुत से इतिहासकारों द्वारा शोध का विषय रहा है, जहाँ कुछ का मानना है कि राजपूत योद्धाओं ने ग़ज़नवी के अमीर की सेना से भय के कारण अपने गढ़ छोड़ दिये और किसी सुरक्षित जग़ह जाकर सरण ले ली, वहीं मुंशी जी 'जय सोमनाथ' में ये दावा किया है कि महमूद को मार्ग में बहुत से राजपूतीं तलवारों का सामना करने मिला। लोहकोट, मुलतान, सपादलक्ष और घोघगढ़ के मार्ग में उसे दिक्कतें आयीं, जहाँ लोहकोट और मुलतान सहजता से गज़नी के आधीन हो गए वहीं सपादलक्ष और घोघागढ़ में सेना का सामना करना पड़ा।
घोघागढ़ के सामने जब मुहमद की सेना पहुँची, तो उसने उस गढ़ को जीतने में समय की बर्बादी समझी क्योंकि उसे जल्द से जल्द प्रभास पाटण पहुँचना था। पर घोघागढ़ का चौहान इतनी सहजता से उसे वहाँ से निकलने नहीं देना चाहते थे, क्योंकि सोमनाथ के पिणाकपाणी उसके आराध्य देव थे, और आमीर उनके आराध्य को लूटने और मंदिर ध्वस्त करने सेना लेकर जा रहा था। घोघगढ़ में आठ सौ राजपूत थे, तीन सौ दूसरे और सात सौ स्त्रियां, घोघा चौहान ने उन्हीं आठ सौ राजपूतों और अन्य को लेकर साका करने की ठानी और लाखों की आमीर की सेना पर टूट पड़ा, एक - एक राजपूत ने पाँच पाँच मलेक्ष् मारे, और अंत में वीरगति को प्राप्त हुए। वहाँ घोघा चौहान को वीरगति प्राप्त करते देख महल की स्त्रियों ने भी जौहर किया, और कैलाश को प्राप्त हुईं।
दूसरी तरफ़ जब आमीर की सेना रेगिस्तान में प्रभास का मार्ग ख़ोज रही थी, तो उन्हें घोघा चौहान का बेटा सज्जन चौहान मिला जिसने आमीर की सेना को रेगिस्तान में भटका दिया, और उस रेत के बबंडर में आमीर की सेना का एक दस्ता धूल में दब गया, लगभग है, हज़ारों की सेना को धूल में गढ़ा छोड़कर गज़नी के आमीर ने जैसे तैसे अपनी जान बचाई। वहीं सज्जन चौहान भी उसी रेत में दब गया। उसके बाद लोगों ने वहां घोघा चौहान के भूत को सोमनाथ की ओर जाते देखा और घोघाबापा के भूत की अफवाह गांव गांव फैलने लगी।
आमीर की सेना रेगिस्तान के तूफ़ान से जो बच निकली वो ज़ल्दी से ज़ल्दी प्रभास की ओर बढ़ने लगी, मार्ग में पाटण को ध्वस्त करती हुई वह प्रभास के मुखाने आ खड़ी हुई, वहां उसे पाटण के महाराज भीमदेव की तीरंदाजों का सामना करना पड़ा। पहले दिन का युद्ध भीमदेव के पाले में रहा, दूसरे दिन आमीर की सेना कोई मौका नहीं छोड़ रही थी और आमीर भी सामने बढ़कर उनका नेतृत्व कर रहा था। वहीं एक गद्दार के कारण आमीर की सेना को सोमनाथ के गुप्त मार्ग का पता चल गया और वे सोमनाथ के भीतर घुस आये, और उस दिन की लड़ाई में भीमदेव घायल हुआ व आबू का परमार मारा गया और लाट के राय भी कैलाश को प्राप्त हुये। आमीर ने मंदिर के मुख्य पुजारी का शीस धड़ से उड़ा दिया और गदा के वार से ज्योतिर्लिंग के टुकड़े कर दिए।
घायल भीम को सामंत चौहन जो सज्जन चौहान का पुत्र और घोघाबापा का पौत्र था वहां से निकाल कर खम्बात ले आया, और वहां घायल भीम का स्वास्थ्य ठीक होने पर उन्होंने पुनः आमीर पर हमला किया, और इस बार थकी हुई आमीर की सेना रेगिस्तान के मार्ग से भाग खड़ी हुई। भीमदेव ने पुनः प्रभास पाटण का निर्माण करवाया और इस बार भव्यतम सोमनाथ मंदिर का निर्माण किया।
वहीं कहानी में आमीर के हमला करने से पहले के सोमनाथ का दृश्य भी है जहां नर्तकियों का जीवन है उनके रहन सहन और मंदिर प्रांगण में नृत्य करने का चित्र भी है। उन्हीं नर्तकियों में चौला भी है और उसकी माँ गंगा भी, गंगा नर्तकियों की मुखिया है और नृत्य और संगीत की छोटी से छोटी बारीकियों की उसे पहचान है। चौला भगवान भोलेनाथ को रिझाने के लिए ही नृत्य करना चाहती है।
मंदिर में बहुत सी कुप्रथाओं का भी प्रपंच था जिन्हें लेकर मंदिर के मुख्य पुजारी गंग सर्वज्ञ भी चिंतित रहा करते थे। इन्हीं सब की और मुंशी जी ध्यान आकृष्ट करते हैं और कहानी कहते चलते हैं।

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