शनिवार, 2 जुलाई 2022

एकलिंग का दीवान - मनु शर्मा

                                                       एकलिंग का दीवान

शर्मा जी ने एक इतिहास को बड़ी शुद्धता से कहानी का रूप दिया है, और बप्पा रावल के बचपन से उनके राजतिलक तक का पूरा दृश्य इस कथा में उतार दिया है. ईडर की महारानी ने बड़े विश्वास से अपने पुत्र की रक्षा का भार अपनी सबसे विश्वासी और प्रिय सखी व् दासी तारा को दिया, तारा ने भी अपने कर्तव्यों का निष्ठा के साथ और पूरी ईमानदारी से पालन किया. वहीँ राज्यपुरोहित सत्यनारायण ने भी स्वामिभक्ति दिखाते हुये महाराज महेंद्र के पुत्र भोज को राज्य से सुरक्षित बहार निकालने का कार्य पूरी श्रद्धा से किया, और वर्षों तक इस राज को राज्य के सरदार से छिपाये रखा. भीलों के बलिदान और माटी प्रेम को भी कथा में दर्शाया गया है, जब तारा जंगलों में भटकती हुई एक ग्राम के पास पहुँची तब एक भील जो अपनी भेड़ ख़ोज रहा था. तारा ने उसे अपनी दशा बताई और सहायता की मांग की, भील ने तारा की जान के जोख़िम पर भी सहायता की, और उसे अगली सुबह भीलों के सरदार से मिलवाकर सारी बात बता दी. यहाँ से तारा, भोज और उस भील सरदार जादव की यात्रा शुरू होती है, और कैसे कैसे और किन किन कठिनाईयों को झेलकर वे भोज की रक्षा करते हुये उसे बड़ा होते देखते हैं. भोज कुछ बड़ा होने पर गाय चराने का काम करता है, और उसी से प्राप्त आय से जीवन गुजर चला रहा है, साथ में उसकी माँ तारा भी है. जब भोज बड़ा हो जाता है तब राजपुरोहित सत्यनारायण उनसे मिलने आते हैं, और फिर भोज के राज्याभिषेक की तैयारी में जुट जाते हैं. इसी बीच एक दिन भोज हरित मुनि के आश्रम पहुँच जाता है, वहीँ कुछ समय पश्चात बड़ी धूम से उसका यज्ञोपवित होता है और उसे 'एकलिंग का दीवान' की उपाधि प्राप्त होती है. अंत में कूटनीति व् राजनीती कर राजपुरोहित उसका चित्तोड़ की गद्दी पर उसका राज्याभिषेक करते हैं, व प्रजा में उसे 'बप्पा रावल' पिता तुल्य बनाते हैं.

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