शनिवार, 20 नवंबर 2021

एक स्वर सहस्त्र प्रतिध्वनियाँ - समीक्षा


भारत में अनेक संस्कृतियों और अनेक सभ्यताओं का मेल हुआ है, इन सभ्यताओं के साथ ही भारत में अनेक विचारों  का आगमन भी हुआ। प्राचीन और मध्य युग की सभ्यता को आधुनिक विज्ञानवाद की दृष्टि से जब समझने का प्रयास किया गया, तब उसने अनेक मान्यताओं पर चोट की। 

भारत मानव सभ्यता का प्राचीन केंद्र रहा है, और इसके अनेक ग्रन्थ उस सभ्यता के साक्षी हैं, पर विज्ञान का युग उन ग्रंथों की कथाओं को काल्पनिक एवं मिथ्या मानता रहा है। 

जब भारत में अंग्रेजी सभ्यता का आरंभ हुआ, तब उसने यहाँ अपनी सभ्यता के द्वार खोलने चाहे, पर उनके मार्ग में भारत के आध्यात्मिक ग्रन्थ बाधक थे। भारत की प्राचीन सभ्यता का ज्ञान यहाँ के बच्चे-बच्चे को था। भारत में अंग्रेजी सभ्यता का प्रसार हो उसके लिए इन बच्चों को उनकी जड़ों से दूर करना ही एकमात्र उपाय था।

वह विज्ञान की क्रांति का भी युग था, कृषि क्षेत्र में भी कई सफ़ल प्रयोग कर अन्न की पैदावार बढ़ाने के प्रयोग चल रहे थे। पौधों में ग्राफ्टिंग कर के एक ही वृक्ष पर अनेक रंगों के फूल सजाये जा रहे थे, इसमें पौधों की जड़ें तो वही रहती हैं, पर उनका ऊपरी स्वभाव बदल जाता है। 

जब अंग्रेजी शिक्षा ने भारत में जगह बनाई तब, उन्होंने यहाँ की जड़ों में बदलाव नहीं किया, उन्होंने उनके मस्तिष्क में एक प्रकार से ग्राफ्टिंग कर दी। इस ग्राफ्टिंग का प्रभाव ये हुआ कि जड़ों से तो हम अपनी परंपरा से जुड़े हैं, पर हमारा ऊपरी भाग उसका विरोधी हो गया।

इस आधुनिक शिक्षा के चलते भ्रम का ऐसा जाल बिछा हुआ है कि युवा वर्ग अपने आप को अपनी संस्कृति से जोड़ने का प्रयास भी नहीं करता। उसके लिए धर्म और कर्म जैसे कार्य बुज़ुर्गों के लिए ही बने हैं। धार्मिक ग्रंथों और अपने इतिहास को जानने का वे प्रयास भी नहीं करते। उन्हें जूलियस सीज़र का इतिहास पता है, उन्हें नेपोलियन का इतिहास पता है, पर अपना इतिहास शून्य है।

"एक स्वर सहस्त्र प्रतिध्वनियाँ" पुस्तक में साकेत जी ने इस भ्रम के जाल को हटाने का प्रयास किया है। इस पुस्तक में ११ छोटी छोटी कथाएँ हैं, जो युवा वर्ग को उनकी संस्कृति से जोड़ने में सहायक होंगी। इन कथाओं में आपको भारतीय संस्कृति के वे स्वर सुनाई देते हैं जिनकी प्रतिध्वनियाँ प्रत्येक युग में सुनने को मिलते रहेंगे, बस ज्योति जलाने वाले हाथ चलते रहें।

 

शनिवार, 30 अक्टूबर 2021

समीक्षा: लेबंटी चाह

Lebanti Chah Lebanti Chah by Abhishek Ojha
My rating: 5 of 5 stars

पढ़ डालिए बस

बहुत कम पुस्तकें आपको अपने से जोड़ पातीं हैं, ये ऐसी ही पुस्तक है जिससे आप जुड़ते चले जाओगे। बचपन से जवानी तक का सफ़र सब आंखों के सामने प्रकट होने लगता है। इतना ही कहेंगे, हाथ लगे तो पढ़ डालिए बस।

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Review: MOSAIC

MOSAIC

बहते जाना है और बस समुद्र में जाकर समा जाना है"

जीवन नदी के प्रवाह सा है, जो बहते हुए समुद्र की गहराइयों में जाकर एक दिन सिमट जाता है, और फ़िर वह भी सागर हो जाता है। इस प्रवाह में अनेक पत्थर, पहाड़ आते हैं, पर नदी के प्रवाह को नहीं रोक पाती, वह बस उसे मोड़ सकते हैं अथवा रास्ता बदलने पर मजबूर कर सकते हैं, पर उसे रोक नहीं पाते। क़भी क़भी प्रवाह इस वेग् से बहता है कि वह पत्थर , पहाड़ सबको अपने साथ बहा ले जाता है।

मानव जीवन में ऐसे पत्थर और पहाड़ अनेक हैं, अनेक चिंताये उसे घेरे रहती हैं। पर मानव उन सबसे मुक्त होने को संध्या का इंतज़ार करता रहता है। कुछ प्रेम भरे शब्दों से थकान मिट जाती है, तो क़भी दुःख भी दे जातें हैं कुछ शब्द।

जीवन की इन्हीं सब उधेड़बुन को शब्दों में ढ़ालने की जादूगरी ही तो है "मोजेक"। जीवन के कई रंगों को शब्दों और चित्रों में इतनी सुंदरता से इस पुस्तक में उतारा गया है, आप इस शब्द और चित्र की दुनियां में कहीं गहरे उतरते जाते हो।

कुछ कवितायें आनंद करातीं है, तो कुछ आपको प्रेरित करती हैं लक्ष्य को निर्धारण करने की ओर। इन छोटी छोटी कविताओं में गहरे उतरते जाइये,आप इनमें अपने आप को भी कहीं पा ही लेंगे। चित्रकार ने इन शब्दों से जो दृश्य रचे हैं, वे आपको शब्दों में ओर उतरने और उन्हें समझने में सहायक है।

कुछ शब्द छाप छोड़ते हैं, मैं एक दो लिख देता हूँ

"Ignorance, or mistake
It's all embroidery now."


"Accept me as I am -
With my mistakes, and all my colours!

समीक्षा: गंजहों की गोष्ठी

गंजहों की गोष्ठी

गंज श्रीलाल शुक्ल जी की व्यंग्य रचना 'रागदरबारी' का केंद्र स्थल है, जहाँ के जन ख़ुद को गंजहे कहलाना पसंद करते हैं। गंज की कहानी गांव और शहर की है जहां व्यवस्था समाज में घर कर चुकी है, और चूंकि व्यवस्था बन चुकी है तो लोग भी ख़ुद को उस हिसाब से ढाल चुके हैं, इन्हीं गंजहों की कहानी और राजनैतिक व्यंग्य था 'रागदरबारी'.

साकेत जी 'गंजहों की गोष्ठी' करवा रहे हैं जिसमें आज की राजनैतिक व्यवस्था को लेकर चर्चा केंद्र में है, और बहुत ही व्यंग्यात्मक लेखनी के साथ साकेत जी ने हमारे लोकतंत्र की वर्तमान व्यवस्था का वर्णन किया है।

समीक्षा: महामानव सरदार

Mahamanav Sardar

मुझे लगता है लोह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के जीवन और उनके राजनैतिक संघर्ष के विषय में इससे अधिक स्पष्ट और सटीक जानकरी प्रदान करती अन्य कोई पुस्तक नहीं हो सकती। दिनकर जोशी जी एक ऐसे लेखक हैं, जो हर विषय को गहरायी में समझते हैं और उस पर लिखते हैं। उनके द्वारा लिखीं महाभारत पर आधारित पुस्तकें पढ़कर आप महाभारत को अच्छे से समझ सकते हैं। उसी प्रकार से उन्होंने गाँधी जी के विषय में भी लिखा है। सरदार वल्लभभाई पटेल से जुड़े हर विषय को जिस समझदारी और स्पष्टता से यहाँ समझने समझाने का प्रयास हुआ है, वो लेखक की प्रतिभा को दर्शाता है।

आप यदि आधुनिक भारत के इतिहास को समझना चाहते हैं तो ये पुस्तक अवश्य पढ़ें.....

शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2021

Review: Unsung Valour: Forgotten Warriors of the Kurukshetra War

Unsung Valour: Forgotten Warriors of the Kurukshetra War

महाभारत के योद्धाओं पर १० अलग - अलग लेखकों के १० निबंधों को संग्रह कर पुस्तक का रूप देने का कार्य किया है इंडिक अकैडमी ने। इस पुस्तक के आवरण पर एक योद्धा को दिखाया गया है, जो संभवतः पार्थ-सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु सा प्रतीत हो रहा है। अभिमन्यु के चक्रव्यूह भेदन और उस चक्रव्यूह में अपने पिता के समान ही वीर प्रदर्शन करते हुए मृत्यु को प्राप्त होना, महाभारत के युद्ध में एक अलग मोड़ लेकर आता है। जिसके बाद पितामह भीष्म द्वारा निर्धारित युद्ध के सभी नियमों को, जो धर्म संगत युद्ध नियम थे, उन्हें दोनों पक्ष के सेनापतियों ने स्वीकार नहीं किया। महाभारत में ऐसे मोड़ की वज़ह अभिमन्यु की वीरता और कौरवों की कायरता दिखी, इस वज़ह से अभिमन्यु को मुख्य पृष्ठ पर दिखाना उचित ही लगता है।

अर्जुन और नाग कन्या उलूपी के पुत्र इरावन से प्रथम अध्याय शुरू होता है, इरावन अपने पिता का बड़ा प्रतापी पुत्र था। आठवें दिन के युद्ध में राक्षस अलम्बुष से युद्ध करते हुए, बड़ी वीरता का प्रदर्शन किया था इरावन ने। राक्षसों की मायावी विद्या को नाग कन्या पुत्र होने के कारण अपनी विद्या से कड़ी टक्कर दी थी इन्होंने।

अलम्बुष, बकासुर का भाई था, जिसे भीम ने वन वास के समय में मारा था, उसी का बदला लेने के लिए अलम्बुष ने कौरव सेना का साथ दिया।

शकुनि को आप किस तरह और कितना जानते हैं, १८ दिन के युद्ध में वो लगातार सम्मिलित था, द्यूत के पासे फेंकने की विद्या में तो वो महारथी था ही, युद्ध के समय तांत्रिक विद्याओं का भी प्रयोग उसे आता था। इस पुस्तक में आपको शकुनि के विषय में भी कुछ अलग जानने को मिलेगा।

घटोत्कच्छ को तो आप जानते ही होगे, एक कार्टून सिरीज़ भी आयी थी उसपर, पर यहाँ जब आप घटोत्कच्छ और उसके पुत्र अंजनपर्व के बारे में पढ़ेंगे तो आप को एक अलग ही कहानी देखने को मिलेगी, और आपको महाभारत में उनका योगदान पता लगेगा। धर्म की जय में क्या योगदान रहा राक्षस वीर घटोत्कच्छ का ये आपको जानना चाहिए। अलयुध राक्षस जो घटोत्कच्छ से बचपन से ही इस लिए ईर्ष्या करता था क्योंकि घटोत्कच्छ की माँ ने राक्षस से विवाह न करके एक मानव से विवाह किया था। ये कहानी आपको तभी पता चल सकती है जब आप महाभारत पढ़ें या फ़िर थोड़े में ज़्यादा जानने की इच्छा हो तो ये पुस्तक पढ़ें।

जयद्रथ की कहानी भी आपको उसके दृष्टिकोण से सुनने में अच्छा लगेगा। जयद्रथ के ही बल पर द्रोणाचार्य ने चक्रव्यूह का निर्माण किया था, क्योंकि जयद्रथ को शिव से वरदान प्राप्त था कि युद्ध के किसी एक दिन अर्जुन को छोड़ अन्य कोई पांडव उसका सामना नहीं कर सकेंगे। इसी कारण से द्रोणाचार्य ने व्यूह के प्रथम द्वार पर उसकी नियुक्ति की।

वैसे तो पुस्तक में आयीं सभी कहानियाँ श्रेष्ठ हैं, पर जब आप भगदत्त और उसके हाथी सुप्रतीक की कहानी पढ़ेंगे तो आपको आश्चर्य होगा कि युद्ध के मैदान में इतने श्रेष्ठ प्रदर्शन के बाद भी भगदत्त को अन्य महारथियों जैसा नाम प्राप्त क्यों नहीं हुआ?. भगदत्त, नरकासुर का पुत्र था, जिसे सत्यभामा ने कृष्ण के साथ मिलकर मारा था, जब वह सहस्त्रों स्त्रियों का अपहरण कर लिए जा रहा था। इसी कारण से भगदत्त कृष्ण से ईर्ष्या रखता था और इसी से इस युद्ध में उसने दुर्योधन का साथ दिया। वह जब अपने हाथी पर सवार होकर युद्ध के मैदान में आता था, तब ऐसा प्रतीत होता था मानों इंद्र ऐरावत पर विराजमान होकर युद्ध करने आये हों। भगदत्त का सामना युद्ध के मैदान में घटोत्कच्छ, भीम और अर्जुन से हुआ, कृष्ण के आदेश पर अर्जुन ने ही भगदत्त की जीवन लीला समाप्त की।

इस पुस्तक में आपको महाभारत के ऐसे योद्धाओं के विषय में जानने को मिलेगा, जिनकी बहुत कम चर्चा हुई है, चाहे वह धारावाहिक की बात हो या आधुनिक पुस्तकों की, इन योद्धाओं को कहीं जगह प्राप्त नहीं हुई है।

जयद्रथ और घटोत्कच्छ की कहानी बहुत बार प्रकट हुई है, पर हर बार उसे पढ़ने पर एक अलग ही आनंद प्राप्त हुआ है। इस पुस्तक को लिखने में जिन १० लेखकों ने सहयोग दिया है उन सभी को भविष्य के लिए बहुत शुभकामनाएं और साई स्वरूपा दीदी को भी धन्यवाद जिन्होंने हमारे लिए इन कहानियों का संग्रह किया।

धन्यवाद इंडिक अकैडमी।

Review: युधिष्ठिर

युधिष्ठिर
युधिष्ठिर जिन्हें धर्मराज की संज्ञा प्राप्त है, उनके जीवन पर प्रकाश डालती यह पुस्तक पठन योग्य है। युद्ध की संभावनाओं को टालने हेतु उन्होंने अनेक प्रयास कर देखे, पर धर्म की हानि इस स्तर तक हो चुकी थी की अब धर्म की स्थापना हेतु युद्ध ही एकमात्र मार्ग शेष रह गया था। भाइयों में युद्ध न हो, इस बात को ध्यान में रखते हुए और दुर्योधन के प्रति भी अपने भाइयों जैसी ही प्रीत रखते हुए उन्होंने द्यूत का निमंत्रण स्वीकार किया। पर उस द्यूत सभा में ये प्रकट हो गया कि नियति ने युद्ध को ही एक मात्र मार्ग क्यों चुना धर्म की स्थापना हेतु।

युधिष्ठिर के सच्चे चरित्र को समझाती यह पुस्तक, बहुत ही सरल भाषा में लिखी गयी है, यदि महाभारत जैसा विशाल ग्रंथ पढ़ने का समय नहीं निकाल पा रहे हैं, तो कन्हैयालाल मानेकलाल मुंशी जी की ७ खंड में उपलब्ध ये कृष्णावतार पुस्तक पढ़कर आप संक्षिप्त रूप में महाभारत का ज्ञान पा सकते हैं।

"ज्ञान योग" में स्वामी विवेकानंद जी के कुछ विचार

 १. जो यह कल्पना है कि "मैं इस नदी के तट पर बैठा हूँ, जब सारा पानी समुद्र में पहुँच जायेगा तब मैं नदी के पार जाऊँगा।" वह उतनी ही भूल करता है जितनी कि यह कहने वाला कि, " जब तक पृथ्वी पूर्ण मंगलमय नहीं हो जाती उतने दिन कार्य करते रहने के बाद सुख भोग करूँगा।" दोनों ही बातें असंभव हैं। माया के बीच में से रास्ता नहीं है, माया के विरुद्ध चल कर ही रास्ता मिलेगा, यह बात भी माननी पड़ेगी।


२. पहले था धर्म का कुसंस्कार, अब है विज्ञान का कुसंस्कार; किन्तु पहले के कुसंस्कार के भीतर एक जीवन दायक अध्यात्मिक भाव रहता था, पर आधुनिक कुसंस्कार द्वारा तो केवल काम और लोभ ही उत्पन्न होता है। वह अन्धविश्वास था ईश्वर की उपासना को लेकर और आजकल का अन्धविश्वास है महाघृणित धन, यश और शक्ति की उपासना को लेकर। यही भेद हैं।


३. यदि तुम जगत् का उपकार करना चाहते हो तो जगत् के ऊपर दोषारोपण करना छोड़ दो।


४. तुम सभी ईश्वर हो; हे मानवगण, हे पशुओं, हे सभी प्रकार के जीवित प्राणियों! तुम सभी एक जीवन्त ईश्वर के प्रकाश हो।


५. हम लोगों को आजीवन यह बात सीखनी होगी कि प्रत्येक व्यक्ति के बारे में उसी के आदर्शों के अनुसार विचार करना होगा, दूसरों के आदर्शों के अनुसार नहीं।



संदर्भ : ज्ञान योग - स्वामी विवेकानंद 

बुधवार, 27 अक्टूबर 2021

Review: તત્વમસિ

તત્વમસિ તત્વમસિ by Dhruv Bhatt
My rating: 5 of 5 stars

સદિયોં થી ચાલી આવતી આપણી પરંપરા જે આધુનિકરણ અને વૈજ્ઞાનિક યુગમાં કોઈનાને માનવામાં ના આવે એવી અનેક દંતકથાઓ છોડી જાયે છે, અને સતત સનાતન એ પરંપરા એમની એમ ચાલી આવે છે. યુગો બદલાયા, વૈજ્ઞાનિક યુગમાં કેટલાક પ્રયોગો પણ થયા, પણ પરંપરા ઉભી ના રહી, એને તો બસ પરિસ્થિતિ અનુરૂપ થોડાઘણા પરિવર્તન કર્યા અને ચાલુ ની ચાલુ રહી. હવે કેટલાક સ્વયંસેવકો આ પરંપરા ને જીવતી રાખવા મેહનત કરે છે. ભારત ના વનમાં રેહવા વાળી પ્રજા સંસાધનો અને કોઈ પણ મદદ વગર પણ વનો ની અંદર આનંદ માં રહે છે, એમના જીવન અને જીવન જીવવાની કળા આ પુસ્તક માં જોવા મળે છે. જ્યાં સ્વાર્થ નહીં, યંત્ર નહીં આધુનિકતા થી દુર, જ્યાં માણસ માં ભરોસો છે, એવા વન ની અંદર પોતાની દુનિયા માં આનંદ થી રેહતી આ પ્રજા જે પ્રકૃતિ ને જ માં માને છે, અને પ્રકૃતિ પણ એમને સંતાન ની જેમ ઉછેરે છે.
માં નર્મદા ની પરિક્રમા વિષય મેં અમૃતલાલ વેગડ ની નર્મદા ત્રય પુસ્તક માં વાંચેલું, અહીં ધ્રુવ ભટ્ટજી એ પરિક્રમા ની યાત્રા અને પરિક્રમા વાશીયો ના માં નર્મદા માં પર વિશ્વાસ ની બાત કરી છે.
તમને આ પુસ્તક વાંચીને ભારત ની વનવાસી પ્રજા અને માં નર્મદા ની આસ પાસ ના ડુંગરો વિષય ઘણી જાણકારી મળી રેહશે ....
નર્મદે હર ....

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Review: Samudrantike

Samudrantike Samudrantike by Dhruv Bhatt
My rating: 5 of 5 stars

સમુદ્ર કિનારા પર રહેનારા માણસો અને તેમના જીવન વિષય ની કેટલીક બાતો જાણવા મળી. સમુદ્ર ના ખારા પાણી ને ભી પૂજતા અને દેવતા માનતા લોકો ને જોયા, એમની શ્રદ્ધા ને જોયા. એક એવી સ્ત્રી ની કથા જાણવા મળી કે જે અન્નપૂર્ણા છે, એક એવા સન્યાસી ની વાર્તા આવી કે જે પ્રકૃતિ જોડે સંવાદ સાધતા જાણતો. ગ્રામજનોની એવી સુંદર પ્રકૃતિ ની જાણ થઈ જ્યાં એમના માટે કોઈ પરાયુ નહીં બધા એમના ગ્રામ માં જે આવે એ એમના મહેમાન ગણાયે. ધ્રુવ ભટ્ટ ની આ બીજી રચના વાંચું છું, માનવો ના વ્યવહાર અને એમના જીવન વિષય ગેહરાઈ થી એમને લખ્યું છે.

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Review: उफ्फ कोलकाता

उफ्फ कोलकाता
सत्य व्यास जी की प्रथम पुस्तक दिल्ली दरबार दोस्ती, प्रेम और करियर के लिए चिंतित युवाओं पर थी, उनकी दूसरी पुस्तक 'बनारस टॉकीज' ने तो जैसे धमाका ही कर दिया था, उस पुस्तक का बहुत बड़ा फैन वर्ग है। फ़िर आयी चौरासी जिसे पढ़कर ऐसा लगा की कुछ अधूरी सी छोड़ दी है कहानी। चौरासी के बाद फ़िर एक कहानी आयी 'बाग़ी बलिया' जो छात्र राजनीती पर आधारित थी, और एक ऐतिहासिक परिपाटी साथ ही जुड़ी थी, जिससे कहानी एक दम दिलचस्प हो गयी थी।

सत्य व्यास की 'उफ़्फ़ कोलकाता' भी हॉस्टल , कॉलेज और छात्रों पर ही आधारित है। हर पुस्तक में व्यास जी ने एक नया प्रयोग करने का प्रयास किया है, और इस पुस्तक की कहानी के लिए उन्होंने हॉरर कॉमेडी को चुना है, जो डराती भी है और गुदगुदाती भी है।

सिद्धार्थ-रूद्र-चेतन की तिकड़ी है, जो मित्र हैं, चेतन की शायरियाँ बहतरीन हैं, जिनका प्रयोग कर सिद्धार्थ लड़कियों को इश्क़ का चाँद बना देता है, और रूद्र, रूद्र अपने मुहावरों के लिए फेमस हैं, इनके छोटे छोटे मुहावरे, आपको भरपूर गुदगुदाएंगे।

कहानी में कई ऐसे प्रश्न छुट गए हैं, जिनका जवाब ही नहीं दिया गया, कुछ कुछ अधूरी सी रह गयी या फ़िर हमारे लिए समझने को छोड़ी गयी है, दो कड़ियाँ हैं, दोनों जुडी हैं या नहीं पता नहीं।

पढ़िए और मज़े लीजिये इस नए उपन्यास का, क्योंकि रूद्र के मुहावरे और चेतन की शायरियाँ आपका भरपूर मनोरंजन करेंगीं।

Review: Main Munna Hun

Main Munna Hun
मुन्ना अपने जीवन के उन पहलुओं को बहुत कम लोगों के साथ ही साझा कर पाता था, जिन पहलुओं में उसे उसके अपनों ने ही छला था. बाल यौन शोषण एक ऐसा मुद्दा है जिसमें अपराधी वर्ग सभ्य समाज का हिस्सा होता है, और वह उन्हें शिकार बनाता है जो अपनी बात को कहने के लिए शब्द भी नहीं जुटा पाते, या इस तरह कहिये कि जो अभी शब्दों को समझना सीख रहे हैं. ये वर्ग ५-१२ वर्ष के बच्चों को अपना शिकार बनाते हैं, और उन्हें डराकर, धमकाकर या लालच देकर उनपर अपने मेले हाथों से हमला करते हैं. मुन्ना समाज के इस वर्ग का शिकार हुआ एक पाँच साल का बच्चा है, जिसे उसके चाचा चॉकलेट का लालच देकर, कमरे में ले जाते हैं और फ़िर जो होता है वह मुन्ना किसी से कह नहीं पाता. इसी तरह का कृत्य उसके साथ उसकी चाची, उसे ट्यूशन पढ़ाने आने वाली दीदी सभी करते हैं, वह रिश्तों में बार बार छला गया.

ऐसे में उसे कोई सुनने वाला नहीं होता था, वो अपनी बीती अपने किन्नू भैया से कहता था, 'किन्नू' हमारी आत्मा, हमारे मन का वो हिस्सा है जिससे हम हर बात कह लेते हैं, जो हमें लगता है एक देवदूत सा आकर हमारे साथ है जो हमें हमारी परेशानियों से बहार निकलने का मार्ग बताएगा.

पुस्तक में वर्णित वृन्दावन और नेपाल का यात्रा वर्णन सुंदर है, और स्थान के बारे में बहुत सी अद्भुत जानकारियाँ हमें जानने को मिलतीं हैं. पुस्तक पढने में आनंद आयेगा, अवश्य पढ़ें.

Review: Gandhi Ki Sundarata । गाँधी की सुंदरता

Gandhi Ki Sundarata । गाँधी की सुंदरता
सुशोभित, इस पुस्तक में गांधी जी की सुंदरता को प्रकट करने का प्रयास कर रहे हैं। पर वे अपने क्रोध को भी नहीं छिपा पा रहे, गांधी विरोधियों के प्रति उनका रोष पुस्तक में बार बार उभर कर आ रहा है।

गांधी जी से जुड़े हर पहलू को सुशोभित ने बहुत कम शब्दों में समझाने का भरपूर प्रयास किया है। आज के समय में बहुत कम समय मिल पाता है एक लंबी पुस्तक को पढ़ पाने का। इस कारण सुशोभित का यह प्रयास सराहनीय ही है जो उन्होंने १५८ पृष्ठों में गांधी जी का समस्त जीवन लिख दिया।

वैसे तो गांधी जी पर ५०,००० पृष्ठों का 'गांधी वांग्मय' उपलब्ध है, तब भी समय समय पर गांधी जी पर लिखा जाता ही रहा है। गांधी जी से प्रभावित हुए बिना कोई नहीं रह सकता, यदि वह उनके लिखे को पढ़ ले, इस बात को सुशोभित ने सही ही लिखा है।

'हिन्द स्वराज' का एक बड़ा प्रशंसक वर्ग है, पर उसके आलोचक बहुतेरे हैं। धरमपाल ने 'गांधी को समझें' में हिन्द स्वराज को बहुत सधे हुए शब्दों में बड़ी सुंदरता से समझाया है।

धरमपाल जी के बाद भी बहुत से लेखकों ने गांधी जी पर लिखा है, पर हिन्द स्वराज का जो सही अर्थ धरमपाल ने समझाया है, वही गांधी जी का सच्चा हिन्द स्वराज है। सुशोभित ने भी उसे उसी ढंग में लिया है, और उसे वर्तमान समय का उदाहरण दिखा कर समझाने का प्रयत्न भी किया है।

पर जिनके प्रति सुशोभित का रोष प्रकट हुआ है, मैंने उन्हें भी पढ़ा है। आप क्रांतिकारी तरीक़े को पसंद नहीं करते, ये सही है। पर आप क्रांतिकारियों के शौर्य को अराजकतावादी भी नहीं ही कह सकते।

क्या 'बिस्मिल की आत्मकथा' पढ़कर आप उन्हें अराजक कह पाएंगे, या सावरकर की 'मेरा आजीवन कारावास' पढ़कर सावरकर से द्वेष रख पाएंगे। आपने ये स्पष्ट किया है कि आपकी भावना किसी के प्रति द्वेष की नहीं है। आप एक समझदार और सुलझे हुए व्यक्तित्व के धनी हैं, पर आपका पाठक वर्ग ऐसा न हो।

धरमपाल ने जिस सरलता से गांधी को समझाने का प्रयास किया है, उसमें किसी के प्रति रोष अथवा क्रोध प्रकट नहीं होता। आपकी शब्दावली में रोष उभर कर सामने आता है।

गांधी किसी से द्वेष नहीं रखते थे, न उनके मन में क्रोध के लिए ही जगह थी। आप इससे भी अच्छा लिख सकते हैं, गांधी जी के बारे में अभी बहुत कुछ है, और मैं आशा करता हूँ आप ऐसे ही इनके बारे में लिखते रहेंगे।

धन्यवाद

शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2021

Review: Makers of Modern Dalit History

Makers of Modern Dalit History
पुस्तक के शीर्षक का हिंदी अनुवाद होता है "आधुनिक दलित इतिहास के निर्माता"। दलित शब्द की उत्पत्ति कुछ १००-२०० वर्ष पूर्व हुई, और इसका शाब्दिक अर्थ होता है दला हुआ अथवा दलन किया हुआ। सामाजिक रूप से शोषित और पिछड़ी जातियों के लिए इसका प्रयोग कुछ ६०-७० वर्षों में अधिक हुआ है। पुस्तक में ऐसे १८ व्यक्तियों से परिचित कराया गया है, जिन्होंने इस सामाजिक बीमारी को चुनौती देने का कार्य किया और अपने समाज के उत्थान में सहयोगी हुए। पुस्तक का शीर्षक है "आधुनिक दलित इतिहास के निर्माता", पर पुस्तक में आपको "वैदिक काल", "उत्तर वैदिक काल" , "मध्य युगीन काल" और "आधुनिक काल" से जुड़े व्यक्तियों का परिचय मिलता है।

पुस्तक से परिचय कराते हुए लेखक ने एक लम्बी भूमिका तैयार की हुई है, जहाँ आपको पूरी पुस्तक का परिचय हो जाता है। यदि आप आगे न भी पढ़ें तब भी आप पुस्तक के बारे में ठीक ठीक जानकारी प्राप्त कर लेते हैं।

इस पुस्तक को किस श्रेणी में रखा जाए ये भी प्रश्न उठता है, क्योंकि इसे इतिहास के रूप में प्रामाणिक नहीं माना जा सकता। पर इसमें जिन व्यक्तियों से परिचित कराया गया है, वे सब इतिहास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस कारण से इसे लोक कथाओं की श्रेणी में रखकर पढ़ना ही उचित होगा।

दलित शब्द जिसका सामाजिक रूप से शोषित वर्ग के लिए पिछले कुछ समय पूर्व ही चलन बढ़ा है, ऐसे सामाजिक वर्ग में वैदिक और उत्तर वैदिक काल के महर्षि वेद व्यास और महर्षि वाल्मीकि को रखना किस प्रकार उचित समझा जाये ये भी प्रश्न उठता है। यदि आप वेद व्यास जी को सामाजिक रूप से शोषित वर्ग का मानते हैं, तब महाभारत में उनसे अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति आपको ढूंढने से भी नहीं मिलता। मैं यहाँ वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था के आधार पर मूल्यांकन नहीं कर रहा जैसा लेखक ने किया है। मैं केवल ये प्रश्न कर रहा हूँ कि क्या आपको महर्षि वेद व्यास सामाजिक रूप से शोषित जान पड़ते हैं?? क्योंकि मुझे महाभारत में उनसे अधिक प्रभावी व्यक्ति कोई दूसरा जान नहीं पड़ता।

आदि कवि वाल्मीकि जी के विषय में भी यही कहा जा सकता है कि वे सामाजिक रूप से शोषित वर्ग के जान नहीं पड़ते। लेखक ने इन दो महर्षियों के विषय में लिखने से पूर्व न महाभारत पढ़ी है और ना ही वाल्मीकि रामायण, क्योंकि उन्होंने संदर्भ में इन ग्रंथों को नहीं जोड़ा है। बिबेक देबरॉय जी की रामायण का सन्दर्भ अवश्य मिलता है, पर उसमें से लेखक ने वाल्मीकि जी का क्या परिचय लिया समझ नहीं आता, क्योंकि लेखक लिखता है "चूँकि वाल्मीकि जी के विषय में अधिक जानकारी प्राप्त नहीं होती, और चूँकि वाल्मीकि समाज आज के समय में शोषित वर्ग है, इसलिए वाल्मीकि जी को दलित मान लेना चाहिए।

लेखक ने अधिकतर व्यक्तियों का परिचय लोककथाओं अथवा इंटरनेट पर उपलब्ध ब्लॉग पढ़कर दिया है, क्योंकि स्रोत में अधिकतर उन्हीं ब्लोग्स और लोककथाओं का ही संदर्भ जोड़ा गया है। इस कारण से पुस्तक को किसी भी व्यक्ति के विषय में प्रामाणिक दस्तावेज नहीं माना जा सकता। झलकारी बाई के जीवन का परिचय देते हुए उस पाठ का शीर्षक लेखक ने दिया है, "रानी झलकारी बाई", अब में तब से यही ढूंढने का प्रयत्न कर रहा हूँ कि झलकारी बाई किस राज्य की रानी थीं। इस पर से आपको अंदाज आ सकता है कि लेखक ने पुस्तक लिखते हुए किस तरह का शोध कार्य किया होगा।

लेखक ने ये भी लिखा है कि "आज भी हजारों दलित स्त्रियों पर ऊँची जाति के लोग बलात्कार जैसे घिनौने अपराध करते हैं । इनके विरुद्ध कई सामाजिक संस्थाएँ और दलित संस्थाएँ आज काम कर रहीं हैं।" इससे लेखक का क्या अभिप्राय है समझ नहीं आता क्योंकि उन्होंने इसमें कहीं भी क़ानून व्यवस्था को नहीं जोड़ा। लेखक को क्या ये लगता है की क़ानून व्यवस्था कुछ काम नहीं कर रहीं। उन्होंने किस आधार पर इन शब्दों को कहा है, ये तो वही जाने।

पुस्तक को पढ़ा जाना चाहिए अथवा नहीं, ये तो पाठक वर्ग स्वयं ही विचार कर सकता है, पुस्तक १८ व्यक्तियों से परिचित तो कराती है पर उनमें से बहुत कम है जो आधुनिक दलित इतिहास के निर्माता कहे जा सकते हैं।

महात्मा गाँधी


आप विश्वास करेंगे की १९-२०वी सदी में एक ऐसा मानव हमारे बीच था, जिसने सत्य को अपना हथियार बनाया था। जनता में एक नए उत्साह को जन्म देने और देश को नई दिशा दिखाने के कारण बापू को कई जगह महात्मा कहकर संबोधित किया जाने लगा।

जिस समय विश्व भर में समाजवाद और वामपंथ सर उठा रहे थे, और जिस समय विचारधारा के नाम पर विश्वयुद्ध जन्म ले रहा था। तब किसी कोने में गांधीवाद के पुष्प भी खिलने लगे थे।

दक्षिण अफ़्रीका में जब उन्हें गोरे-काले के भेद के कारण रेल के प्रथम दर्ज़े से टिकट होने के बाद भी उतार दिया गया, तब उन्होंने इस मानव निर्मित दुर्गुण से लड़ने का संकल्प ठाना। दक्षिण अफ़्रीका में उनका प्रयोग सफ़ल हुआ और उन्होंने सत्याग्रह के बल पर वहाँ के भारतीय समुदाय में एक नई ऊर्जा को जन्म लेते देखा।

महात्मा गाँधी का भारत आगमन जनवरी १९१५ में हुआ, उनका मुंबई में जोरदार स्वागत किया गया। गाँधी जी ने भारत आकर यहाँ की गरीबी और सामाजिक भेद भाव की समस्या को देखा। उन्होंने देखा जहाँ कुछ लोगों के पास पहनने को एक कपड़ा तक नहीं है, वहीँ कुछ लोग सोने के वस्त्र और अलंकारों से भी अपनी शोभा बढ़ा रहे हैं। 

गाँधी जी ने इस भेद को ख़तम करने की युक्ति ख़ोज निकाली, उन्होंने स्वयं कम वस्त्र पहनने आरंभ कर दिए और चरखा लेकर सूत कातने लग गए। उन्होंने देश को बताया पहले हम स्वयं को तैयार करें, हमारी मूल समस्याओं से बहार निकलें, उसके बाद हम स्वराज के लिए लड़ेंगे। 

देश भर के कई पुरुष और महिलाएं गाँधी जी के साथ उनके प्रयास में जुड़ गए और स्वदेशी चरखे से गरीबों के लिए वस्त्र की जुगाड़ में जुट गए। 

कुछ समय पहले उन्होंने लन्दन से लौटते हुए, अपने विचार एक छोटी सी पुस्तक के माध्यम से प्रकाशित किये थे, जिसे हिन्द स्वराज के नाम से प्रकाशित किया गया। गाँधी जी ने इसमें अंधे औद्योगीकरण की आलोचना करते हुए कहा है की ये मानव को शारीरिक और मानसिक रूप से कमज़ोर करने के साधन है। 

हिन्द स्वराज एक छोटी पुस्तक है, पर इसका प्रभाव बड़ा जोर से हुए, कई लोगों ने इसमें लिखे गाँधी जी के विचारों को अव्यावहारिक कहा है। पर गाँधी जी का मानना था, उन्होंने जिन विचारों को इस पुस्तक में लिखा है, वे मानव और प्रकृति दोनों के आपसी तालमेल को बनाये रखने में उपयोगी हैं। जो अन्धा औद्योगीकरण हो रहा है उससे प्रकृति को भी नुकसान हो रहा, तथा मानव भी आलस्य और झूठ की तरफ बढ़ रहा है।  


पुस्तक - दिग्विजय : गुरुदत्त

दिग्विजय [Digvijaya] by गुरुदत्त My rating: 5 of 5 stars भगवान आदि शंकराचार्य जी ने पवित्र भारत भूमि के चारों दिशाओं की यात्रा कर वहाँ स्...