आप विश्वास करेंगे की १९-२०वी सदी में एक ऐसा मानव हमारे बीच था, जिसने सत्य को अपना हथियार बनाया था। जनता में एक नए उत्साह को जन्म देने और देश को नई दिशा दिखाने के कारण बापू को कई जगह महात्मा कहकर संबोधित किया जाने लगा।
जिस समय विश्व भर में समाजवाद और वामपंथ सर उठा रहे थे, और जिस समय विचारधारा के नाम पर विश्वयुद्ध जन्म ले रहा था। तब किसी कोने में गांधीवाद के पुष्प भी खिलने लगे थे।
दक्षिण अफ़्रीका में जब उन्हें गोरे-काले के भेद के कारण रेल के प्रथम दर्ज़े से टिकट होने के बाद भी उतार दिया गया, तब उन्होंने इस मानव निर्मित दुर्गुण से लड़ने का संकल्प ठाना। दक्षिण अफ़्रीका में उनका प्रयोग सफ़ल हुआ और उन्होंने सत्याग्रह के बल पर वहाँ के भारतीय समुदाय में एक नई ऊर्जा को जन्म लेते देखा।
महात्मा गाँधी का भारत आगमन जनवरी १९१५ में हुआ, उनका मुंबई में जोरदार स्वागत किया गया। गाँधी जी ने भारत आकर यहाँ की गरीबी और सामाजिक भेद भाव की समस्या को देखा। उन्होंने देखा जहाँ कुछ लोगों के पास पहनने को एक कपड़ा तक नहीं है, वहीँ कुछ लोग सोने के वस्त्र और अलंकारों से भी अपनी शोभा बढ़ा रहे हैं।
गाँधी जी ने इस भेद को ख़तम करने की युक्ति ख़ोज निकाली, उन्होंने स्वयं कम वस्त्र पहनने आरंभ कर दिए और चरखा लेकर सूत कातने लग गए। उन्होंने देश को बताया पहले हम स्वयं को तैयार करें, हमारी मूल समस्याओं से बहार निकलें, उसके बाद हम स्वराज के लिए लड़ेंगे।
देश भर के कई पुरुष और महिलाएं गाँधी जी के साथ उनके प्रयास में जुड़ गए और स्वदेशी चरखे से गरीबों के लिए वस्त्र की जुगाड़ में जुट गए।
कुछ समय पहले उन्होंने लन्दन से लौटते हुए, अपने विचार एक छोटी सी पुस्तक के माध्यम से प्रकाशित किये थे, जिसे हिन्द स्वराज के नाम से प्रकाशित किया गया। गाँधी जी ने इसमें अंधे औद्योगीकरण की आलोचना करते हुए कहा है की ये मानव को शारीरिक और मानसिक रूप से कमज़ोर करने के साधन है।
हिन्द स्वराज एक छोटी पुस्तक है, पर इसका प्रभाव बड़ा जोर से हुए, कई लोगों ने इसमें लिखे गाँधी जी के विचारों को अव्यावहारिक कहा है। पर गाँधी जी का मानना था, उन्होंने जिन विचारों को इस पुस्तक में लिखा है, वे मानव और प्रकृति दोनों के आपसी तालमेल को बनाये रखने में उपयोगी हैं। जो अन्धा औद्योगीकरण हो रहा है उससे प्रकृति को भी नुकसान हो रहा, तथा मानव भी आलस्य और झूठ की तरफ बढ़ रहा है।
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