रश्मिरथी का अर्थ सूर्य की रश्मियों पर सवार रथी, दिनकर जी ने महाभारत के पात्र कर्ण को सूर्य के प्रकाश सा तेजश्वी चित्रित किया है, और उनका मानना है कि कर्ण सूर्य की रश्मियों पर सवार होकर कुरुक्षेत्र का युद्ध लड़ने के लिए ही और दरिद्रों के दुःख दूर करने को ही पृथ्वी पर रथ पे सवार होकर आया था।
महाभारत में कर्ण के पात्र को अधर्म का साथ देते हुए बताया है, दिनकर जी कर्ण के ओजश्वी प्रतिभा का गुणगान करते हैं, और उसके अधर्म के साथ देने का कारण बतलाते हैं।
कर्ण सूत पुत्र था इस कारण से उसे समाज में स्थान प्राप्त नहीं हुआ, वह एक योद्धा था पर उसे क्षत्रियों सा सम्मान प्राप्त नहीं हुआ. जब दुर्योधन ने उसे मित्र कहकर अंग देश का राज्य उसे दे दिया तब वह दुर्योधन का ऋणी हो गया और उन दोनों की परम मित्रता को भी दिनकर जी उजागर करते हैं अपने काव्यों में।
स्वयंवर में अपनी प्रतिभा को न दिखा पाने के कारण जो कर्ण के मन में चोट पहुँची उसे दिनकर जीने अपने काव्यों में समेटा है. पांचाली के चीरहरण से लेकर कुरुक्षेत्र के मैदान तक जो कर्ण के मन की व्यथा थी उसे दिनकर जी ने काव्यों में सुंदर रूप दिया है।
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