डर बनाने की प्यारी कोशिश
बोलना ही है पुस्तक में कुछ भी ऐसा नहीं है जो आपको बोलने के लिए उत्साहित या प्रेरित करे। यह पुस्तक एक अदृश्य डर को दिखाकर भड़काने का प्रयास करती दिखती है। डर का माहौल बनाना, ही शायद पुस्तक का एकमात्र उद्देश्य है।
एक तरफा झुकाव पुस्तक को पढ़ने से ज्ञात होता है। आपको गौरी लंकेश की हत्या पर चिंता जताते हुए लेखक दिखते हैं, पर लेखक कमलेश तिवारी पर बोलते नहीं दिखते। लेखक पहलू खान, अखलाक के लिए बोलते हैं, पर पालघर के साधुओं पर चुप्पी साधे दिखते हैं। एक तरफा लेखनी लिख कर एक समुदाय को भयभीत करने का प्रयास करना ही जैसे उनकी चाहत है।
डर के माहौल के बाद वे प्रेमलाप का प्रसंग भी छेड़ते हैं, लेखक को पब्लिक पार्क में लव के साथ मैट करने की स्वतंत्रता चाहिए। उनके शब्द उसी के इर्द गिर्द घूमते दिखते हैं।
पुस्तक की समाप्ति वे सिटीजन पत्रकारिता की चर्चा करते हुए करते हैं। विषय सही चुना है पर उसके साथ न्याय करते हुए नहीं दिखते वरिष्ठ पत्रकार।
बुधवार, 29 जून 2022
बोलना ही है - रविश कुमार
उसने गांधी को क्यों मारा - अशोक कुमार पाण्डेय
किसी के प्रति मन में द्वेष रखकर कोई दस्तावेज़ लिखा जाए तो उसे साहित्य की श्रेणी में ही रखना उचित होगा, उसे ऐतिहासिक दस्तावेज कहना भूल होगी। विचार स्वतंत्र होते हैं, पर स्वतंत्र विचारों को केवल साहित्य में ही स्थान प्राप्त हो सकता है। आप यदि इतिहास लिखने बैठे हैं तो आपको अपने विचारों को शांत रखकर उस समय के उस स्थान और व्यक्ति के विचारों को ही अपने दस्तावेज़ में स्थान देना होता है।
प्रस्तुत पुस्तक में लेखक अमर्यादित होते हुए सावरकर के प्रति अपने द्वेष को प्रदर्शित कर रहे हैं। उनका द्वेष केवल सावरकर और नथुराम तक ही सीमित नहीं रहता वल्कि वे पूरे ब्राह्मण समाज को उस द्वेष में जोड़ लेते हैं। जिस प्रकार वो चित्तपावन ब्राह्मणों को बालगंगाधर तिलक से लेकर भगवान परशुराम तक जोड़ते हैं, वह उनके मानसिक असंतोष को ही प्रदर्शित करता है।
प्रमाण जुटाने का कार्य उन्होंने इस पुस्तक के लिए किया है पर वह पूरी तरह से एक तरफा है। गांधी जी की हत्या में आप नथुराम को फांसी देने को उचित ठहरा सकते हो, वह हत्यारा था तो उसे फांसी होनी ही चाहिए। पर आप नथुराम का धर्म और उसके ब्राह्मण होने को जिस तरह दिखाने का प्रयास करते पाए जाते हैं, वह आपके विचार है जिन्हें आप इतिहास के साथ घोलना चाहते हैं।
मार्क्सवाद का सिद्धांत जिसमें वह धर्म को अफ़ीम कहता है, उसे स्थापित करने का प्रयास करते हैं आप। सरदार भगतसिंह के समाजवादी विचारों को बढ़ा बढ़ाकर दिखाने का प्रयास करते हैं, और उन्हें मार्क्स और लेनिन के समीप बताने की कोशिश भी करते हैं। आप जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन डे में हत्याओं का आंकड़ा बताते हैं, वह आंकड़ा आप कहां से लाए हैं, उसकी जानकारी प्राप्त नहीं होती। इसमें भी आप एक तरफ़ के आंकड़ों को दबाने के लिए दूसरी तरफ़ के मृतकों की संख्या को बार बार दोहराते पाए जाते हैं। आप ये स्थापित करना चाहते हैं की इस पक्ष की हत्या अधिक संख्या में हुई है।
इसे इतिहासिक दस्तावेज़ बताकर आप अपने पाठकों पर अपने विचारों को थोपना चाहते हैं। इसलिए मैं इस पुस्तक को केवल नफ़रत की कलम से लिखा विचारों का थोथा ही कहूंगा।
भगतसिंह की फांसी का सच - कुलदीप नैयर
एक पूर्ण दस्तावेज
भगतसिंह और उनके साथियों पर जो अभियोग चले और न्यायालयों में जो वाद प्रतिवाद हुए, उन सभी कार्रवाइयों का एक विस्तृत दस्तावेज़ है ये पुस्तक। कुलदीप नैयर ने हर पहलू को स्पष्ट रूप में रखने का प्रयास किया है।
भगतसिंह जी के जीवन से जुड़े अनेक प्रसंग और घटनाएँ इस पुस्तक में जानने को मिलती हैं। उनके विचार और उनकी मित्र मंडली में कौन कौन क्रांतिकारी युवा उनसे जुड़े थे, उनपर प्रकाश डालती है पुस्तक।
पुस्तक से कुछ उद्धरण :-
१. एक क्रांतिकारी के लिए हत्या का मतलब क्या होता है? भगत सिंह ने इसे अपने ही शब्दों में समझाया था— “हम मनुष्य के जीवन को काफी पवित्र मानते हैं। हम मनुष्य के जीवन को पावन समझते हैं...किसी को घायल करने की बजाय आज नहीं तो कल, हम अपने प्राणों और सेवा को मानवता पर न्योछावर कर देंगे।” भगत सिंह के मन में न विद्वेष था, न बदले की भावना थी— “ऐसी काररवाइयों (हत्याओं) का वहीं तक राजनीतिक महत्त्व होता है, जहाँ तक वे एक मानसिकता और एक माहौल बनाने में सहायक होती हैं, जो आखिरी संघर्ष के लिए निहायत जरूरी हो जाता है, बस।”
२. भगत सिंह ने उनसे कहा था, “क्रांतिकारियों को तो शहीद होना ही है, क्योंकि वे जिस मकसद के लिए लड़ते हैं, उसे बलिदान से ताकत मिलती है, कोर्ट में अपील करने से नहीं।”
३. “अगर मुझे बख्श दिया गया तो तबाही मच जाएगी। यदि मैं शहीद हुआ, मुसकानों में लिपटा हुआ रहा तो भारत की माताएँ चाहेंगी कि उनके बच्चे भी भगत सिंह की राह पर चलें और इस प्रकार स्वतंत्रता सेनानियों की संख्या इतनी बड़ी हो जाएगी कि शैतानी ताकतों के लिए क्रांति के मार्च को रोक पाना असंभव हो जाएगा...”
४. “माँ, मुझे इसमें कोई शक नहीं कि मेरा देश एक दिन आजाद होगा; लेकिन मुझे डर है कि जिस कुरसी को गोरे साहिब खाली करेंगे, उस पर काले साहिब बैठ जाएँगे।”
प्रभास - तृषार
इस पुस्तक की कथायें आपको एक यात्रा पर लिए जाती हैं। आप थक हार कर सूर्य के ढलने पर जब अनेक विचारों के जाल में घिरे होते हैं। अक्सर संध्या समय ही अधिकतर चिंताएं आपको आकर घेर लेती हैं। तो इस पुस्तक की कथा की शुरुआत उसी संध्या के सूर्य से होती है। आपकी चिंताओं का मंथन करती हुई कथाएं कब सूर्य के उदय होने का संकेत कर देती हैं, आपको पता ही नहीं लगता। आपकी चिंताएं दूर हो जाती हैं और आप एक लंबी यात्रा करके सुखद अनुभव करते हैं। पढ़िए और उन चिंताओं से घिरे बादलों को छांटने का प्रयास करिए प्रभास के क्षेत्र में थोड़ा टहल आइए।
मंगलवार, 28 जून 2022
क्रांतिदूत भाग १ - मनीष श्रीवास्तव
क्रांतिदूत भाग २ - मनीष श्रीवास्तव
पुस्तक - दिग्विजय : गुरुदत्त
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