मंगलवार, 28 जून 2022

क्रांतिदूत भाग २ - मनीष श्रीवास्तव

 



क्रांतिदूत शृन्खला का प्रथम भाग आपको आज़ाद जी के जीवन के उस अध्याय पर ले जाता है, जहाँ वे काकोरी काण्ड के बाद अज्ञातवास का जीवन जी कर रहे हैं। प्रथम भाग जहाँ झाँसी पर आधारित था, वहीं दूसरा भाग काशी पर आधारित है। दोनों ही पुस्तक आप स्वतंत्र पढ़ सकते हैं, क्योंकि दोनों की कहानी एक दुसरे से जुडी हुईं नहीं हैं। झाँसी जहाँ अज्ञातवास का जीवन था, वहीं काशी क्रांति का उद्घोष था, जिसमें कई क्रांतिवीर उभर कर आते हैं, और क्रांति पट पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।


क्यों पढ़नी चाहिए ये पुस्तक?


भारत भूमि पर अनेक आक्रांताओं के आक्रमण समय समय पर होते रहे हैं, भूमि पुत्रों ने भी अपनी मातृभूमि की रक्षा में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, इस उम्मीद में की आने वाली पीढ़ियाँ, उन्हें कायर न समझे। समय की दौड़ में हम उन सब के योगदान को भुला चुके हैं। भारतीय स्वतंत्रता के यज्ञ में आहूत होने वाले वीरों में से केवल कुछ एक को ही साहित्य अथवा इतिहास में स्थान मिल पाया है। इस दूसरी पुस्तक में मेरे सामने बहुत से ऐसे नाम आए जिन्हें मैंने पहले कभी न पढ़ा था और न जिनके बारे में कहीं पढ़ा था। गेंदालाल दीक्षित, प्रफुल्ल चाकी जैसे क्रांति वीर और चम्बल के कुछ डकैतों का भी योगदान हमें स्वतंत्रता के साहित्य के अध्याय में जुड़ते हुए मिलते हैं। पर इन अध्यायों को कभी लिखित स्वरूप प्राप्त नहीं हुआ। ये जो कमी हमारे साहित्य संसार में रह गयी थी, उसे डॉ. मनीष श्रीवास्तव अपनी क्रांतिदूत पुस्तक शृन्खला से भरने का प्रयास करते दिखते हैं। समय निकालकर अवश्य पढ़ें ये शृन्खला, सच मानिये आप निराश नहीं होंगे

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