किसी के प्रति मन में द्वेष रखकर कोई दस्तावेज़ लिखा जाए तो उसे साहित्य की श्रेणी में ही रखना उचित होगा, उसे ऐतिहासिक दस्तावेज कहना भूल होगी। विचार स्वतंत्र होते हैं, पर स्वतंत्र विचारों को केवल साहित्य में ही स्थान प्राप्त हो सकता है। आप यदि इतिहास लिखने बैठे हैं तो आपको अपने विचारों को शांत रखकर उस समय के उस स्थान और व्यक्ति के विचारों को ही अपने दस्तावेज़ में स्थान देना होता है।
प्रस्तुत पुस्तक में लेखक अमर्यादित होते हुए सावरकर के प्रति अपने द्वेष को प्रदर्शित कर रहे हैं। उनका द्वेष केवल सावरकर और नथुराम तक ही सीमित नहीं रहता वल्कि वे पूरे ब्राह्मण समाज को उस द्वेष में जोड़ लेते हैं। जिस प्रकार वो चित्तपावन ब्राह्मणों को बालगंगाधर तिलक से लेकर भगवान परशुराम तक जोड़ते हैं, वह उनके मानसिक असंतोष को ही प्रदर्शित करता है।
प्रमाण जुटाने का कार्य उन्होंने इस पुस्तक के लिए किया है पर वह पूरी तरह से एक तरफा है। गांधी जी की हत्या में आप नथुराम को फांसी देने को उचित ठहरा सकते हो, वह हत्यारा था तो उसे फांसी होनी ही चाहिए। पर आप नथुराम का धर्म और उसके ब्राह्मण होने को जिस तरह दिखाने का प्रयास करते पाए जाते हैं, वह आपके विचार है जिन्हें आप इतिहास के साथ घोलना चाहते हैं।
मार्क्सवाद का सिद्धांत जिसमें वह धर्म को अफ़ीम कहता है, उसे स्थापित करने का प्रयास करते हैं आप। सरदार भगतसिंह के समाजवादी विचारों को बढ़ा बढ़ाकर दिखाने का प्रयास करते हैं, और उन्हें मार्क्स और लेनिन के समीप बताने की कोशिश भी करते हैं। आप जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन डे में हत्याओं का आंकड़ा बताते हैं, वह आंकड़ा आप कहां से लाए हैं, उसकी जानकारी प्राप्त नहीं होती। इसमें भी आप एक तरफ़ के आंकड़ों को दबाने के लिए दूसरी तरफ़ के मृतकों की संख्या को बार बार दोहराते पाए जाते हैं। आप ये स्थापित करना चाहते हैं की इस पक्ष की हत्या अधिक संख्या में हुई है।
इसे इतिहासिक दस्तावेज़ बताकर आप अपने पाठकों पर अपने विचारों को थोपना चाहते हैं। इसलिए मैं इस पुस्तक को केवल नफ़रत की कलम से लिखा विचारों का थोथा ही कहूंगा।

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