बुधवार, 29 जून 2022

बोलना ही है - रविश कुमार


 

डर बनाने की प्यारी कोशिश

बोलना ही है पुस्तक में कुछ भी ऐसा नहीं है जो आपको बोलने के लिए उत्साहित या प्रेरित करे। यह पुस्तक एक अदृश्य डर को दिखाकर भड़काने का प्रयास करती दिखती है। डर का माहौल बनाना, ही शायद पुस्तक का एकमात्र उद्देश्य है।
एक तरफा झुकाव पुस्तक को पढ़ने से ज्ञात होता है। आपको गौरी लंकेश की हत्या पर चिंता जताते हुए लेखक दिखते हैं, पर लेखक कमलेश तिवारी पर बोलते नहीं दिखते। लेखक पहलू खान, अखलाक के लिए बोलते हैं, पर पालघर के साधुओं पर चुप्पी साधे दिखते हैं। एक तरफा लेखनी लिख कर एक समुदाय को भयभीत करने का प्रयास करना ही जैसे उनकी चाहत है।

डर के माहौल के बाद वे प्रेमलाप का प्रसंग भी छेड़ते हैं, लेखक को पब्लिक पार्क में लव के साथ मैट करने की स्वतंत्रता चाहिए। उनके शब्द उसी के इर्द गिर्द घूमते दिखते हैं।
पुस्तक की समाप्ति वे सिटीजन पत्रकारिता की चर्चा करते हुए करते हैं। विषय सही चुना है पर उसके साथ न्याय करते हुए नहीं दिखते वरिष्ठ पत्रकार।

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