ज़िम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए नायिका एक उम्र पार कर जाती है, वह उम्र जो स्वतंत्र और स्वच्छंद होती है और साथी चुनने में सहायक होती है। अब नायिका उस उम्र में पहुँच चुकीं हैं जहाँ साथी की कमी उन्हें महसूस होने लगी है। शाम को आंगन में बैठ कर मार्ग में पड़ने वाले पचपन खम्भों को वो अपने आंगन से गिन सकतीं हैं, साथ ही उनकी रोशनी में हॉस्टल की लाल दीवारें चमकने लगतीं हैं। यही पचपन खम्भे और लाल दीवारें उनके शाम के साथी हैं।
जब सब परेशानियों से निकाल ले जाने के लिए एक साथी उनके जीवन में आ जाता है, तब परिवार का ख्याल कर और समाज का ख्याल कर वो अपने पैर पीछे खींच लेतीं हैं। जीवन के अकेलेपन को और आपके अकेलेपन पर निरंतर पड़ती समाज की दृष्टी को पुस्तक में समेटने का प्रयास किया गया है।
शीर्षक पचपन खम्भे लाल दीवारें ठीक ही लगता है, जब ये इस बात के सूचक हैं कि जीवन कितना एकाकी है जो दीवारों पर पड़ती रोशनी और मार्ग पर पड़ते खम्भों को देखने में बीत रहा है।
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