
सुशोभित, इस पुस्तक में गांधी जी की सुंदरता को प्रकट करने का प्रयास कर रहे हैं। पर वे अपने क्रोध को भी नहीं छिपा पा रहे, गांधी विरोधियों के प्रति उनका रोष पुस्तक में बार बार उभर कर आ रहा है।
गांधी जी से जुड़े हर पहलू को सुशोभित ने बहुत कम शब्दों में समझाने का भरपूर प्रयास किया है। आज के समय में बहुत कम समय मिल पाता है एक लंबी पुस्तक को पढ़ पाने का। इस कारण सुशोभित का यह प्रयास सराहनीय ही है जो उन्होंने १५८ पृष्ठों में गांधी जी का समस्त जीवन लिख दिया।
वैसे तो गांधी जी पर ५०,००० पृष्ठों का 'गांधी वांग्मय' उपलब्ध है, तब भी समय समय पर गांधी जी पर लिखा जाता ही रहा है। गांधी जी से प्रभावित हुए बिना कोई नहीं रह सकता, यदि वह उनके लिखे को पढ़ ले, इस बात को सुशोभित ने सही ही लिखा है।
'हिन्द स्वराज' का एक बड़ा प्रशंसक वर्ग है, पर उसके आलोचक बहुतेरे हैं। धरमपाल ने 'गांधी को समझें' में हिन्द स्वराज को बहुत सधे हुए शब्दों में बड़ी सुंदरता से समझाया है।
धरमपाल जी के बाद भी बहुत से लेखकों ने गांधी जी पर लिखा है, पर हिन्द स्वराज का जो सही अर्थ धरमपाल ने समझाया है, वही गांधी जी का सच्चा हिन्द स्वराज है। सुशोभित ने भी उसे उसी ढंग में लिया है, और उसे वर्तमान समय का उदाहरण दिखा कर समझाने का प्रयत्न भी किया है।
पर जिनके प्रति सुशोभित का रोष प्रकट हुआ है, मैंने उन्हें भी पढ़ा है। आप क्रांतिकारी तरीक़े को पसंद नहीं करते, ये सही है। पर आप क्रांतिकारियों के शौर्य को अराजकतावादी भी नहीं ही कह सकते।
क्या 'बिस्मिल की आत्मकथा' पढ़कर आप उन्हें अराजक कह पाएंगे, या सावरकर की 'मेरा आजीवन कारावास' पढ़कर सावरकर से द्वेष रख पाएंगे। आपने ये स्पष्ट किया है कि आपकी भावना किसी के प्रति द्वेष की नहीं है। आप एक समझदार और सुलझे हुए व्यक्तित्व के धनी हैं, पर आपका पाठक वर्ग ऐसा न हो।
धरमपाल ने जिस सरलता से गांधी को समझाने का प्रयास किया है, उसमें किसी के प्रति रोष अथवा क्रोध प्रकट नहीं होता। आपकी शब्दावली में रोष उभर कर सामने आता है।
गांधी किसी से द्वेष नहीं रखते थे, न उनके मन में क्रोध के लिए ही जगह थी। आप इससे भी अच्छा लिख सकते हैं, गांधी जी के बारे में अभी बहुत कुछ है, और मैं आशा करता हूँ आप ऐसे ही इनके बारे में लिखते रहेंगे।
धन्यवाद
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