शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2021

Review: Unsung Valour: Forgotten Warriors of the Kurukshetra War

Unsung Valour: Forgotten Warriors of the Kurukshetra War

महाभारत के योद्धाओं पर १० अलग - अलग लेखकों के १० निबंधों को संग्रह कर पुस्तक का रूप देने का कार्य किया है इंडिक अकैडमी ने। इस पुस्तक के आवरण पर एक योद्धा को दिखाया गया है, जो संभवतः पार्थ-सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु सा प्रतीत हो रहा है। अभिमन्यु के चक्रव्यूह भेदन और उस चक्रव्यूह में अपने पिता के समान ही वीर प्रदर्शन करते हुए मृत्यु को प्राप्त होना, महाभारत के युद्ध में एक अलग मोड़ लेकर आता है। जिसके बाद पितामह भीष्म द्वारा निर्धारित युद्ध के सभी नियमों को, जो धर्म संगत युद्ध नियम थे, उन्हें दोनों पक्ष के सेनापतियों ने स्वीकार नहीं किया। महाभारत में ऐसे मोड़ की वज़ह अभिमन्यु की वीरता और कौरवों की कायरता दिखी, इस वज़ह से अभिमन्यु को मुख्य पृष्ठ पर दिखाना उचित ही लगता है।

अर्जुन और नाग कन्या उलूपी के पुत्र इरावन से प्रथम अध्याय शुरू होता है, इरावन अपने पिता का बड़ा प्रतापी पुत्र था। आठवें दिन के युद्ध में राक्षस अलम्बुष से युद्ध करते हुए, बड़ी वीरता का प्रदर्शन किया था इरावन ने। राक्षसों की मायावी विद्या को नाग कन्या पुत्र होने के कारण अपनी विद्या से कड़ी टक्कर दी थी इन्होंने।

अलम्बुष, बकासुर का भाई था, जिसे भीम ने वन वास के समय में मारा था, उसी का बदला लेने के लिए अलम्बुष ने कौरव सेना का साथ दिया।

शकुनि को आप किस तरह और कितना जानते हैं, १८ दिन के युद्ध में वो लगातार सम्मिलित था, द्यूत के पासे फेंकने की विद्या में तो वो महारथी था ही, युद्ध के समय तांत्रिक विद्याओं का भी प्रयोग उसे आता था। इस पुस्तक में आपको शकुनि के विषय में भी कुछ अलग जानने को मिलेगा।

घटोत्कच्छ को तो आप जानते ही होगे, एक कार्टून सिरीज़ भी आयी थी उसपर, पर यहाँ जब आप घटोत्कच्छ और उसके पुत्र अंजनपर्व के बारे में पढ़ेंगे तो आप को एक अलग ही कहानी देखने को मिलेगी, और आपको महाभारत में उनका योगदान पता लगेगा। धर्म की जय में क्या योगदान रहा राक्षस वीर घटोत्कच्छ का ये आपको जानना चाहिए। अलयुध राक्षस जो घटोत्कच्छ से बचपन से ही इस लिए ईर्ष्या करता था क्योंकि घटोत्कच्छ की माँ ने राक्षस से विवाह न करके एक मानव से विवाह किया था। ये कहानी आपको तभी पता चल सकती है जब आप महाभारत पढ़ें या फ़िर थोड़े में ज़्यादा जानने की इच्छा हो तो ये पुस्तक पढ़ें।

जयद्रथ की कहानी भी आपको उसके दृष्टिकोण से सुनने में अच्छा लगेगा। जयद्रथ के ही बल पर द्रोणाचार्य ने चक्रव्यूह का निर्माण किया था, क्योंकि जयद्रथ को शिव से वरदान प्राप्त था कि युद्ध के किसी एक दिन अर्जुन को छोड़ अन्य कोई पांडव उसका सामना नहीं कर सकेंगे। इसी कारण से द्रोणाचार्य ने व्यूह के प्रथम द्वार पर उसकी नियुक्ति की।

वैसे तो पुस्तक में आयीं सभी कहानियाँ श्रेष्ठ हैं, पर जब आप भगदत्त और उसके हाथी सुप्रतीक की कहानी पढ़ेंगे तो आपको आश्चर्य होगा कि युद्ध के मैदान में इतने श्रेष्ठ प्रदर्शन के बाद भी भगदत्त को अन्य महारथियों जैसा नाम प्राप्त क्यों नहीं हुआ?. भगदत्त, नरकासुर का पुत्र था, जिसे सत्यभामा ने कृष्ण के साथ मिलकर मारा था, जब वह सहस्त्रों स्त्रियों का अपहरण कर लिए जा रहा था। इसी कारण से भगदत्त कृष्ण से ईर्ष्या रखता था और इसी से इस युद्ध में उसने दुर्योधन का साथ दिया। वह जब अपने हाथी पर सवार होकर युद्ध के मैदान में आता था, तब ऐसा प्रतीत होता था मानों इंद्र ऐरावत पर विराजमान होकर युद्ध करने आये हों। भगदत्त का सामना युद्ध के मैदान में घटोत्कच्छ, भीम और अर्जुन से हुआ, कृष्ण के आदेश पर अर्जुन ने ही भगदत्त की जीवन लीला समाप्त की।

इस पुस्तक में आपको महाभारत के ऐसे योद्धाओं के विषय में जानने को मिलेगा, जिनकी बहुत कम चर्चा हुई है, चाहे वह धारावाहिक की बात हो या आधुनिक पुस्तकों की, इन योद्धाओं को कहीं जगह प्राप्त नहीं हुई है।

जयद्रथ और घटोत्कच्छ की कहानी बहुत बार प्रकट हुई है, पर हर बार उसे पढ़ने पर एक अलग ही आनंद प्राप्त हुआ है। इस पुस्तक को लिखने में जिन १० लेखकों ने सहयोग दिया है उन सभी को भविष्य के लिए बहुत शुभकामनाएं और साई स्वरूपा दीदी को भी धन्यवाद जिन्होंने हमारे लिए इन कहानियों का संग्रह किया।

धन्यवाद इंडिक अकैडमी।

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