
पुस्तक के शीर्षक का हिंदी अनुवाद होता है "आधुनिक दलित इतिहास के निर्माता"। दलित शब्द की उत्पत्ति कुछ १००-२०० वर्ष पूर्व हुई, और इसका शाब्दिक अर्थ होता है दला हुआ अथवा दलन किया हुआ। सामाजिक रूप से शोषित और पिछड़ी जातियों के लिए इसका प्रयोग कुछ ६०-७० वर्षों में अधिक हुआ है। पुस्तक में ऐसे १८ व्यक्तियों से परिचित कराया गया है, जिन्होंने इस सामाजिक बीमारी को चुनौती देने का कार्य किया और अपने समाज के उत्थान में सहयोगी हुए। पुस्तक का शीर्षक है "आधुनिक दलित इतिहास के निर्माता", पर पुस्तक में आपको "वैदिक काल", "उत्तर वैदिक काल" , "मध्य युगीन काल" और "आधुनिक काल" से जुड़े व्यक्तियों का परिचय मिलता है।
पुस्तक से परिचय कराते हुए लेखक ने एक लम्बी भूमिका तैयार की हुई है, जहाँ आपको पूरी पुस्तक का परिचय हो जाता है। यदि आप आगे न भी पढ़ें तब भी आप पुस्तक के बारे में ठीक ठीक जानकारी प्राप्त कर लेते हैं।
इस पुस्तक को किस श्रेणी में रखा जाए ये भी प्रश्न उठता है, क्योंकि इसे इतिहास के रूप में प्रामाणिक नहीं माना जा सकता। पर इसमें जिन व्यक्तियों से परिचित कराया गया है, वे सब इतिहास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस कारण से इसे लोक कथाओं की श्रेणी में रखकर पढ़ना ही उचित होगा।
दलित शब्द जिसका सामाजिक रूप से शोषित वर्ग के लिए पिछले कुछ समय पूर्व ही चलन बढ़ा है, ऐसे सामाजिक वर्ग में वैदिक और उत्तर वैदिक काल के महर्षि वेद व्यास और महर्षि वाल्मीकि को रखना किस प्रकार उचित समझा जाये ये भी प्रश्न उठता है। यदि आप वेद व्यास जी को सामाजिक रूप से शोषित वर्ग का मानते हैं, तब महाभारत में उनसे अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति आपको ढूंढने से भी नहीं मिलता। मैं यहाँ वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था के आधार पर मूल्यांकन नहीं कर रहा जैसा लेखक ने किया है। मैं केवल ये प्रश्न कर रहा हूँ कि क्या आपको महर्षि वेद व्यास सामाजिक रूप से शोषित जान पड़ते हैं?? क्योंकि मुझे महाभारत में उनसे अधिक प्रभावी व्यक्ति कोई दूसरा जान नहीं पड़ता।
आदि कवि वाल्मीकि जी के विषय में भी यही कहा जा सकता है कि वे सामाजिक रूप से शोषित वर्ग के जान नहीं पड़ते। लेखक ने इन दो महर्षियों के विषय में लिखने से पूर्व न महाभारत पढ़ी है और ना ही वाल्मीकि रामायण, क्योंकि उन्होंने संदर्भ में इन ग्रंथों को नहीं जोड़ा है। बिबेक देबरॉय जी की रामायण का सन्दर्भ अवश्य मिलता है, पर उसमें से लेखक ने वाल्मीकि जी का क्या परिचय लिया समझ नहीं आता, क्योंकि लेखक लिखता है "चूँकि वाल्मीकि जी के विषय में अधिक जानकारी प्राप्त नहीं होती, और चूँकि वाल्मीकि समाज आज के समय में शोषित वर्ग है, इसलिए वाल्मीकि जी को दलित मान लेना चाहिए।
लेखक ने अधिकतर व्यक्तियों का परिचय लोककथाओं अथवा इंटरनेट पर उपलब्ध ब्लॉग पढ़कर दिया है, क्योंकि स्रोत में अधिकतर उन्हीं ब्लोग्स और लोककथाओं का ही संदर्भ जोड़ा गया है। इस कारण से पुस्तक को किसी भी व्यक्ति के विषय में प्रामाणिक दस्तावेज नहीं माना जा सकता। झलकारी बाई के जीवन का परिचय देते हुए उस पाठ का शीर्षक लेखक ने दिया है, "रानी झलकारी बाई", अब में तब से यही ढूंढने का प्रयत्न कर रहा हूँ कि झलकारी बाई किस राज्य की रानी थीं। इस पर से आपको अंदाज आ सकता है कि लेखक ने पुस्तक लिखते हुए किस तरह का शोध कार्य किया होगा।
लेखक ने ये भी लिखा है कि "आज भी हजारों दलित स्त्रियों पर ऊँची जाति के लोग बलात्कार जैसे घिनौने अपराध करते हैं । इनके विरुद्ध कई सामाजिक संस्थाएँ और दलित संस्थाएँ आज काम कर रहीं हैं।" इससे लेखक का क्या अभिप्राय है समझ नहीं आता क्योंकि उन्होंने इसमें कहीं भी क़ानून व्यवस्था को नहीं जोड़ा। लेखक को क्या ये लगता है की क़ानून व्यवस्था कुछ काम नहीं कर रहीं। उन्होंने किस आधार पर इन शब्दों को कहा है, ये तो वही जाने।
पुस्तक को पढ़ा जाना चाहिए अथवा नहीं, ये तो पाठक वर्ग स्वयं ही विचार कर सकता है, पुस्तक १८ व्यक्तियों से परिचित तो कराती है पर उनमें से बहुत कम है जो आधुनिक दलित इतिहास के निर्माता कहे जा सकते हैं।
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