न जाने कितनी चादरें ओढ़ रखीं है इस ग़ुलाब ने,
हर चादर के भीतर से एक नई मुस्कान निकलती है।
मेरे मन में बसे ग़ुलाब को ये नई मुस्कान लुभाती है,
और एक मुस्कान लिये वो मेरे होंठों पे आ जाती है।।
ऐ मेरे ग़मले के ग़ुलाब, आज वह दिन आ गया है जब तुझे प्रतिदिन दिए जाने वाले जल का कर्ज़ उतारना है। मेरा प्रेम संदेश लेकर मेरे मेहबूब के पास जा और उनसे मेरा प्रेम निवेदन कह, उनसे कहना कि उनकी यादों में रातें न करवट बदल रही और न आँखें झपक रहीं। बस एक टक उनकी याद में साँसे थाम रखीं हैं, ये प्रेम निवेदन स्वीकार न हुआ तो ये साँसे रुक जाएंगी।


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