आज सरकार क़ानूनी डंडा लेकर कुछ यूट्यूबर्स के पीछे पिल पड़ी है। पर किसी मंच से इस तरह का कंटेंट परोसा जा रहा है, तो उसके लिए ज़िम्मेदार कौन है ??
जो आज डंडा लेकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मापने निकल पड़े हैं, उन्होंने समाज में नैतिक मूल्यों को बढ़ाने के लिए कौन से कार्य किए हैं ??
आज अधिकतर युवा समय रैना, इलाहाबादियों जैसों के कंटेंट को फॉलो कर रहे हैं तो उसके लिए जिम्मेदारी किसकी तय होती है ??
युवाओं के पास विकल्प क्या हैं ? शहरों में मैदान ?? अब तो गांव में भी अतिक्रमण होने लगा है, उधर भी नहीं बचे।
पुस्तकालय ?? संविधान के किसी अनुच्छेद में शायद हर ज़िले में पुस्तकालयों का प्रावधान है ?? कितने जिलों में हैं पुस्तकालय ??
जब युवाओं को विकल्प ही कमरों में एकांत में रहने का दोगे तो वो एकांत में वही सुनेंगे और वही करेंगे जो उन्हें भाएगा। बंद कमरों में जीवन काटने को मजबूर युवाओं के लिए जो थोड़े बहुत विकल्प हैं वो यहीं हैं।
अधिकतर युवा जो यूट्यूबर हैं, वो घर से बहुत कम बाहर निकलते हैं। बंद कमरों के विचार हैं, जिन्होंने राक्षसी स्वरूप ग्रहण किया है। सरकार को डंडा लेकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मापने के स्थान पर विकल्पों पर कार्य करना चाहिए।
ग़लती तुम्हारी और भुगते युवा, ये तो न्याय नहीं हुआ।

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