KARNLOK by Dhruv BhattMy rating: 5 of 5 stars
भारत सामाजिक मान्यताओं एवं परम्पराओं का देश है। जिन मान्यताओं को समाज स्वीकार नहीं करता, हम उनसे दूरी बनाकर ही चलते हैं। जहाँ इन मान्यताओं का उद्देश्य अराजकता और उच्छृंखलता को रोकना होता है, वहीं कभी कभी इन मान्यताओं में कुछ कमजोरियां भी प्रकट होती रहती हैं। व्यापक समाज को साधने के लिए कुछ अनचाहे निर्णय कठोरता से लेने पड़ते हैं।
कर्णलोक अनाथ बच्चों की कहानी है, किसी के माता पिता किसी दुर्घटना में उनसे दूर हो गए हैं, तो कुछ ऐसे भी बच्चे हैं जिन्हें समाज के भय से अनाथालय पहुँचा दिया गया है। अनाथालय में उन्हें किस तरह का जीवन मिलता है, उनसे कैसा व्यवहार किया जाता है, उसके पीछे की जो पीड़ा है, जो एक दीवार के पीछे छिप कर रह जाती है। ध्रुव भट्ट जी बार बार पीली दीवार के ज़रिये यही संकेत करते हैं कि एक संसार इस दीवार के पीछे भी पल रहा है, जो बाक़ी संसार से बहुत अलग है। यहाँ बच्चे उम्र से पहले बड़े हो जाते हैं, और जीवन को अपनी उम्र से अधिक जी लेते हैं।
अनाथ जीवन के कड़वे अनुभव और उनकी पीड़ा को, बड़ी सहजता है से ध्रुव भट्ट जी ने सरल शब्दों में अपने उपन्यास में रचा है। कई ऐसे भाव सामने आते हैं, जहाँ आप सोचने पर मजबूर हो जाते हो कि क्या सही है और क्या ग़लत? इन्हीं सही ग़लत के बीच की कहानी है "कर्णलोक".
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