Krantidoot #Mitramela by Manish ShrivastavaMy rating: 5 of 5 stars
क्रांतिदूत शृंखला का तृतीय भाग आपको सावरकर के संकल्प से परिचित कराती है। संकल्प जो उन्होंने अपने बचपन में माँ अष्ट भवानी के सामने लिया था कि वह अपना जीवन राष्ट्र सेवा में खपा देंगे। उसी संकल्प लेने के क्षण को पुस्तक अपने आवरण पृष्ठ पर जगह देती है। सावरकर के बचपन के किस्सों से शुरू हुआ अध्याय, उनके संकल्प से संगठन तक के सफ़र पर लिए चलती है। मित्रमेला जो एक संगठित दल था और जिसकी भावना केवल राष्ट्र सेवा से ओतप्रोत थी, वही दल विदेश यात्रा करते हुए जब लंदन पहुँचता है, तब अभिनव भारत को जन्म देता है।
पुस्तक पढ़कर आप सावरकर के जीवन के कुछ विस्मृत अध्यायों को जान सकेंगे और एक राष्ट्र प्रेम की भावना आपके भीतर भी जल उठेगी।
वंदेमातरम् .....
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